February Purnima 2026: फरवरी में कब है माघ पूर्णिमा? यहां जानें क्या है शुभ तिथि, मुहूर्त और इसका धार्मिक महत्व…

February Purnima 2026: सनातन धर्म में माघ पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। यह तिथि स्नान, दान, व्रत और जप के लिए अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन किए गए धार्मिक कार्य शीघ्र फल प्रदान करते हैं और श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

बता दें कि साल 2026 में फरवरी माह में माघ पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। इसी दिन कल्पवास का समापन भी होता है और भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है।

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फरवरी में माघ पूर्णिमा कब है?

1.माघ पूर्णिमा तिथि- 1 फरवरी 2026

2.पूर्णिमा तिथि प्रारंभ- 1 फरवरी सुबह 05:52 बजे

3. पूर्णिमा तिथि समाप्त- 2 फरवरी सुबह 03:38 बजे

4. चंद्रोदय समय – शाम 05:26 बजे

माघ पूर्णिमा 2024 में कब है?

धार्मिक नियमों का पालन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति

माघ पूर्णिमा के दिन धार्मिक नियमों का पालन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन श्रद्धालुओं को निम्नलिखित विधि अपनानी चाहिए। इसके लिए सूर्योदय से पहले किसी पवित्र नदी में स्नान करें। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु की पूजा करें और व्रत रखें। इसके बाद जप, हवन और दान  करें। पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करें फिर निर्धन लोगों और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें।

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माघ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

माघ पूर्णिमा का नाम मघा नक्षत्र से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ महीने में देवता मनुष्य रूप धारण कर प्रयागराज में स्नान, दान और जप करते हैं। इसी कारण पूरे माघ मास में गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। जो श्रद्धालु पूरे माघ महीने स्नान नहीं कर पाते, उनके लिए माघ पूर्णिमा का दिन अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने से पापों का नाश होता है, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। Read More February Purnima 2026: फरवरी में कब है माघ पूर्णिमा? यहां जानें क्या है शुभ तिथि, मुहूर्त और इसका धार्मिक महत्व…

शनिवार को सुंदरकांड का पाठ करने का है विशेष महत्व, जानें इसको करने से होने वाले प्रमुख लाभ…

BE NEWS – हिंदू सनातन धर्म में हर दिन किसी न किसी देवी देवता के समर्पित है। ऐसे ही शनिवार और मंगलवार का दिन हनुमान जी को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन हनुमान चालीसा और सुंदर कांड का पाठ करने से जातक को शनिदेव से संबधित सभी कष्टों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। आइए जानें इसका विशेष महत्व…

सुंदरकांड का बहुत ही फलदायी

हिंदू धर्म में शनिवार के दिन सुंदर कांड और हनुमान चालीसा को पाठ करने का विशेष महत्व है। धर्म शास्त्रों के अनुसार गोस्वामी तुलसी दास जी द्वारा लिखित ‘श्री रामचरितमानस’ के पांचवें अध्याय, सुंदरकांड का बहुत ही लाभकारी और फलदायी माना जाता है। वैसे तो हर दिन इसका पाठ किया जा सकता है पर शनिवार के दिन इसका विशेष महत्व माना जाता है। कहते है कि शनिवार के दिन हनुमान चालीसा और सुंदर कांड का पाठ करने से बजरंगबली के साथ- साथ शनिदेव का भी आशीर्वाद भी मिलता है। जीवन में बार-बार आ रही परेशानियां, ग्रह दोष दूर हो जाते है।

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सुंदरकांड का पाठ करने होने वाले लाभ

कहते है कि सुंदरकांड का पाठ करने से शनि की साढें साती, ढैय्या और महादशा के कष्टों से मुक्ति मिलती है। जीवन में सुख- शांति आती हैं। ऐसी मान्यता है कि संकल्प लेकर लगातार सुंदरकांड का पाठ करने से भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं, साथ ही बल और बुद्धि भी मिलती हैं। घर में मौजूद प्रेत बाधा, नकारात्मक शक्तियां और बुरी नजर दूर होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सुंदरकांड का पाठ करते समय इसको अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए।

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Basant Panchami 2026: मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए लगाएं ये 5 विशेष पीले भोग, करियर में मिलेगी अपार सफलता

Basant Panchami 2026 – बसंत पंचमी सनातन धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन ज्ञान और कला की देवी माता सरस्वती की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर भक्त माता को विशेष भोग अर्पित करते हैं।

इस साल बसंत पंचमी 23 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। आइए जानते हैं कि माता सरस्वती को कौन-कौन सी चीजें भोग के रूप में लगाई जाती हैं और उनके महत्व के बारे में…

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1.माता सरस्वती के प्रिय भोग मालपुआ

माता सरस्वती के प्रिय भोग मालपुआ बसंत पंचमी पर माता सरस्वती को मालपुए का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। विशेषकर विद्यार्थी इसे अर्पित करें, तो शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

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2. बेसन की बर्फी

बेसन की बर्फी बेसन से बनी मीठी बर्फी भी माता को अर्पित की जा सकती है। भोग लगाने के बाद इसे प्रसाद के रूप में परिवार और मित्रों में बांटा जा सकता है।

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3. बूंदी या बूंदी के लड्डू

बूंदी या बूंदी के लड्डू मीठी बूंदी माता सरस्वती को अत्यंत प्रिय है। इसके लड्डू बनाकर भोग चढ़ाना भी शुभ माना जाता है। पीले मीठे चावल पीला रंग माता को बहुत भाता है।

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4. पीले मीठे चावल

बसंत पंचमी पर माता सरस्वती को पीले मीठे चावल बनाने के लिए केसर, सूखा मावा, देसी घी और चावल का उपयोग किया जा सकता है।

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5. केसर की खीर या हलवा

केसर की खीर या हलवा केसर से बनी मिठाइयाँ माता की प्रिय हैं। इसलिए भोग के रूप में आप केसर हलवा या केसर खीर भी अर्पित कर सकते हैं।

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6. भोग में अर्पित करें फल 

बसंत पंचमी पर माता सरस्वती को भोग में अगर ऊपर बताई गई सामग्री उपलब्ध नहीं है, फल जैसे तो केला, सेब, संतरा, बेर, नारियल जैसे फल भी भोग के रूप में अर्पित किए जा सकते हैं।

भोग अर्पित करने का महत्व

भोग अर्पित करने का महत्व बसंत पंचमी पर माता सरस्वती को भोग अर्पित करने से शिक्षा, करियर और पारिवारिक जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं। इसके अलावा, जो व्यक्ति आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर है, उसके लिए माता की पूजा आलौकिक अनुभवों और आशीर्वाद का मार्ग खोलती है।

बसंत पंचमी का यह पर्व केवल देवी की पूजा का ही नहीं बल्कि ज्ञान और रचनात्मकता का उत्सव भी है। माता सरस्वती की कृपा से जीवन में न केवल विद्या की वृद्धि होती है बल्कि व्यक्ति का मन भी शांत बनता है। Read More Basant Panchami 2026: मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए लगाएं ये 5 विशेष पीले भोग, करियर में मिलेगी अपार सफलता

Ayodhya Ram Mandir: रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर उमड़ा भक्ति का सैलाब, ‘जय श्रीराम’ उद्घोष से गूंजा अयोध्या का परिसर

Ramlala Pratishtha Divas 2026- अयोध्या में रामलला प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जा रही है। यह वही ऐतिहासिक दिन है, जब 2024 में सदियों की प्रतीक्षा के बाद प्रभु श्रीराम अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए थे। यह अवसर केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हर राम भक्त के लिए आस्था, विश्वास और गौरव का प्रतीक बन चुका है।

रामलला प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ

आपको बता दें कि गुरुवार, 22 जनवरी 2026 का दिन हर राम भक्त के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। इसी दिन अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रीरामलला प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ मनाई जा रही है। इस ऐतिहासिक अवसर पर भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। इस पावन दिन पर अयोध्या में श्रद्धालुओं  के साथ- साथ देश-विदेश से आए भक्त रामलला के दिव्य दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। कोई मंदिर में पहुंचकर प्रभु के चरणों में शीश नवाता है, तो कोई अपने घर में ही विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर इस शुभ दिन को मना रहा है।

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रामलला की दिव्य प्रतिमा

बाल रूप में विराजमान प्रभु श्रीराम का यह स्वरूप ऐसा प्रतीत कराता है मानो वे साक्षात अपने भक्तों को दर्शन दे रहे हों। इस कोमल और दिव्य रूप की पूजा अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती है। रामलला की यह प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित है, जिसे कृष्ण शिला के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि यह पत्थर हजारों वर्षों तक अपनी मजबूती और सौंदर्य बनाए रखता है। इसी विशेष शिला से बनी यह मूर्ति आध्यात्मिक और शिल्प कला का अद्भुत संगम है। शिल्प और विशेषताएं रामलला की इस भव्य मूर्ति का निर्माण कर्नाटक के प्रसिद्ध मूर्तिकार अरुण योगीराज ने किया है। यह प्रतिमा एक ही पत्थर से तराशी गई है, जो इसे और भी विशिष्ट बनाती है।

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भगवान विष्णु के अवतारों का प्रतीकात्मक रूप

जानकारी के अनुसार, मूर्ति का वजन लगभग 200 किलोग्राम है, ऊंचाई 4.24 फीट और चौड़ाई करीब तीन फीट है। इस प्रतिमा की एक और विशेषता यह है कि इसमें भगवान विष्णु के दसों अवतारों का भी प्रतीकात्मक रूप से दर्शन होता है, जो इसे आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। सूर्य तिलक का दिव्य क्षण हर वर्ष रामनवमी के पावन अवसर पर सूर्यदेव स्वयं प्रभु रामलला का ‘सूर्य तिलक’ करते हैं। सूर्य की किरणों से भगवान के मस्तक का यह दिव्य अभिषेक भक्तों के हृदय को भक्ति और आनंद से भर देता है। यह दृश्य न केवल आध्यात्मिक अनुभूति कराता है, बल्कि विज्ञान और परंपरा के अद्भुत समन्वय को भी दर्शाता है।

राम मंदिर का ऐतिहासिक सफर

अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि पर प्राचीन काल से रामलला का मंदिर विद्यमान था, जिसे 16वीं शताब्दी में आक्रमणकारी बाबर द्वारा नष्ट कर दिया गया। इसके बाद लगभग 500 वर्षों तक यह स्थल विवाद और संघर्ष का केंद्र बना रहा। दशकों की कानूनी लड़ाई और सामाजिक आंदोलन के बाद भगवान राम की जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का पुनर्निर्माण संभव हो सका। वर्ष 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा आधुनिक भारत के इतिहास का एक भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण बन गई। रामलला प्रतिष्ठा दिवस 2026 न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आस्था और एकता का एक प्रतीक बन चुका है। Read More Ayodhya Ram Mandir: रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर उमड़ा भक्ति का सैलाब, ‘जय श्रीराम’ उद्घोष से गूंजा अयोध्या का परिसर

Friday Worship Ritual: देवी लक्ष्मी और संतोषी मां की विशेष कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन करें ये उपाय, भूलकर भी न करें ये काम…

Friday Worship Ritual: हिंदु धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी- देवता को समर्पित है। जिसमें से शुक्रवार का दिन देवी लक्ष्मी और संतोषी मां को समर्पित है। कहते है कि इस दिन पूजा करने से घर में सुख- समृद्धि, धन- धान्य की कोई कमी नहीं रहती है।

मां लक्ष्मी और संतोषी को समर्पित शुक्रवार का दिन

आपको बता दें कि शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी और संतोषी को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा से घर में धन, सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। खासतौर पर अगर पूजा सही नियमों के साथ की जाए और कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखा जाए, तो मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

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शुक्रवार की पूजा विधि

शुक्रवार के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ या गुलाबी रंग के वस्त्र पहने चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर या साफ स्थान पर मां लक्ष्मी और संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। मन में श्रद्धा रखते हुए संकल्प लें और पूजा की शुरुआत करें। पूजा के दौरान मां को लाल चुनरी, सिंदूर, चूड़ियां, धूप और घी का दीपक अर्पित करें। भोग में गुड़-चना, खीर या सफेद मिठाई चढ़ाना शुभ माना जाता है। अंत में मां से परिवार की सुख-समृद्धि, धन- धान्य और सौभाग्य की कामना करें।

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शुक्रवार के दिन भूलकर भी न करें ये काम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुछ गलतियां ऐसी हैं जो शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी को अप्रसन्न कर सकती हैं।

1. गंदगी न रखें- शुक्रवार के दिन घर के किसी भी कोने में गंदगी नहीं होनी चाहिए। माना जाता है कि मां लक्ष्मी स्वच्छ स्थान पर ही निवास करती हैं।

2. गंदे या फटे कपड़े न पहनें- इस दिन हमेशा साफ-सुथरे और सलीके वाले वस्त्र पहनें।

3. पैसों का लेन-देन न करें- शुक्रवार को न तो किसी को उधार देना शुभ माना जाता है और न ही उधार लेना।

4. प्रॉपर्टी से जुड़े कार्य टालें- वास्तु शास्त्र के अनुसार, इस दिन जमीन-जायदाद से संबंधित काम करने से बचना चाहिए।

5. रसोई का सामान न खरीदें- मान्यता है कि शुक्रवार को रसोई से जुड़ा सामान खरीदने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं।

अगर आप शुक्रवार के दिन पूरी श्रद्धाभाव के साथ व्रत करते हैं और उसके नियमों के पालन करते हैं तो मां की कृपा आपके जीवन में हमेशा बना रहेगी। घर में सुख- समृद्धि, धन- धान्य और सौभाग्य की कोई कमी नहीं रहती है। Read More Friday Worship Ritual: देवी लक्ष्मी और संतोषी मां की विशेष कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन करें ये उपाय, भूलकर भी न करें ये काम…

Vastu Shastra: भूलकर भी घर में खाली न छोड़ें ये 5 चीजें, नहीं तो बनी रहेगी कंगाली, जानिए क्या है वास्तु के नियम…

BE NEWS – वास्तु शास्त्र हमारे घर और जीवन की ऊर्जा को संतुलित रखने का बहुत ही प्राचीन तरीका है। कहा जाता है कि हमारे आसपास का वातावरण सीधे हमारे जीवन, धन, स्वास्थ्य और रिश्तों पर असर डालता है। कई बार छोटी-छोटी आदतें भी नकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित कर सकती हैं।

वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में कुछ चीजों को खाली छोड़ना विशेष रूप से अशुभ माना जाता है। आइए जानते हैं उन चीजों के बारे में जिन्हें कभी खाली नहीं रखना चाहिए।

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1. पर्स में नोट या सिक्का रखना शुभ

वास्तु के अनुसार, पर्स और तिजोरी में हमेशा कुछ न कुछ धन होना चाहिए। पर्स में कम से कम एक नोट या सिक्का रखना शुभ होता है। वहीं, तिजोरी में भी पैसे या कोई कीमती वस्तु जरूर रखें। ऐसा करने से धन का प्रवाह बना रहता है और आर्थिक स्थिति मजबूत रहती है।

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2. कभी खाली न छोड़ें मंदिर का जल पात्र

घर के मंदिर या पूजा स्थल में रखे जल पात्र को कभी खाली न छोड़ें। इसमें रोज ताजा पानी डालें और चाहें तो फूल या आम के पत्ते भी डाल सकते हैं। ऐसा करने से पूजा का प्रभाव बढ़ता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

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3. बाल्टी या लोटा खाली रखना अशुभ

बाथरूम में बाल्टी या लोटा खाली रखना शुभ नहीं माना जाता। वास्तु शास्त्र के अनुसार, खाली बाल्टी मानसिक अशांति और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकती है। इसलिए हमेशा इसमें थोड़ा पानी भरा रखें।

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4. अन्नपूर्णा का स्थान रसोई का अनाज पात्र

रसोई को मां अन्नपूर्णा का स्थान माना जाता है। इसलिए अनाज का पात्र कभी खाली न छोड़ें। समय-समय पर नया अनाज डालते रहें। यह घर में समृद्धि, खुशहाली और परिवारिक सुख को बनाए रखने में मदद करता है।

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5. कभी भी किसी का अपमान न करें

वास्तु शास्त्र में यह भी बताया गया है कि हमारे शब्द हमारे जीवन पर बड़ा असर डालते हैं। कभी भी किसी का अपमान न करें, खासकर घर के बड़े-बुजुर्गों से। गलत या कठोर शब्दों से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं और घर में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है। हमेशा सोच-समझकर और प्यार से बोलें।

इन छोटी-छोटी वास्तु आदतों का पालन करके आप अपने घर में धन, स्वास्थ्य और खुशहाली को बनाए रख सकते हैं। पर्स, पूजा स्थल, रसोई, बाथरूम और अपने शब्दों का सही इस्तेमाल करके नकारात्मक ऊर्जा से बचा जा सकता है। Read More Vastu Shastra: भूलकर भी घर में खाली न छोड़ें ये 5 चीजें, नहीं तो बनी रहेगी कंगाली, जानिए क्या है वास्तु के नियम…

शिवलिंग पर जल अर्पण के समय किन तीन पवित्र स्थानों के स्पर्श करना है अत्यंत शुभ, जानिए उसका आध्यात्मिक महत्व…

BE NEWS – हिंदू सनातन धर्म में देवों को देव महादेव को विशेष स्थान दिया गया है। उनको प्रसन्न करना बहुत ही आसान है। जिन पर उनकी कृपा हो जाए उसके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। कहते है शिवलिंग पर अगर एक लोटा जल भी अर्पित करने मात्र से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। उनकी शिवलिंग के स्पर्श मात्र से भी हर तरह के कष्टों से निजात मिलती हैं। ऐसे में जल चढ़ाने से लेकर शिवलिंग को स्पर्श करने तक कई नियम बताए गये हैं, जिनके बारे में आपको पता होना जरुरी है।

पवित्र स्थानों को स्पर्श और उनके आध्यात्मिक महत्व

आज हम आपको बताते है कि शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग पर सीधे जल चढ़ाने से पहले कुछ विशेष स्थानों का स्पर्श और पूजन करना अत्यंत शुभ माना गया है। जिनके स्पर्श करने मात्र से भय, रोग और कुंडली दोषों से निजात मिलती है और जीवन व विवाह संबधी समस्याएं भी दूर हो जाती है। आइए जानते हैं उन तीन पवित्र स्थानों और उनके आध्यात्मिक महत्व के बारे में।

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शिवलिंग का आध्यात्मिक स्वरूप

शिवलिंग केवल भगवान शिव का प्रतीक नहीं है। जिसमें भगवान भोलेनाथ का पूरा परिवार वास करता है।  बल्कि इसमें माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और पुत्री अशोक सुंदरी का भी वास माना गया है। इसलिए जल अर्पण करते समय श्रद्धा और विधि का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय का स्थान

शिवलिंग के अग्र भाग में दाईं और बाईं ओर जो स्थान होता है, वहां भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय विराजमान माने जाते हैं। सबसे पहले इन दोनों स्थानों को अपने हाथों से स्पर्श करें। यहां जल अर्पित करें और 5 से 7 बार हल्के हाथों से दबाएं। इस दौरान शिव मंत्रों का जाप करें। ऐसा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और बच्चों से जुड़ी परेशानियां व रोग दूर होने की मान्यता है।

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दूसरा अशोक सुंदरी का स्थान

शिव पुराण के अनुसार, शिवलिंग के मध्य भाग, जहां से जल प्रवाहित होता है, वहां भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी का वास माना गया है। इस स्थान पर पहले बेलपत्र अर्पित करें। फिर इस स्थान को स्पर्श करते हुए जल चढ़ाएं। मन ही मन अपनी इच्छा भगवान शिव के सामने रखें। इस विधि से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और मांगलिक दोष से राहत मिलती है।

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तीसरा माता पार्वती का स्थान

शिवलिंग के चारों ओर बने गोल आधार (जलहरी) में माता पार्वती का वास माना जाता है। सबसे पहले इस स्थान को श्रद्धा से स्पर्श करें। फिर यहां जल अर्पित करें। मान्यता है कि इससे शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है और गंभीर बीमारियों में भी लाभ प्राप्त होता है।

अंत में जल अर्पित करें

इन तीनों पवित्र स्थानों का स्पर्श और पूजन करने के बाद अंत में पूरे शिवलिंग पर जल अर्पित करें। ऐसा करने से पूजा संपूर्ण मानी जाती है और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। Read More शिवलिंग पर जल अर्पण के समय किन तीन पवित्र स्थानों के स्पर्श करना है अत्यंत शुभ, जानिए उसका आध्यात्मिक महत्व…

VasantPanchami2026: बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनने की परंपरा क्यों है खास? जानिए इसके पाछे के धार्मिक, वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण…

BE NEWS – बसंत पंचमी का त्योहार मां सरस्वती की पूजा को समर्पित होता है। इस दिन सभी लोग देवी मां की आराधना  करते है। परम्परा के अनुसार इस दिन पर पीले वस्त्र पहने जाते है, पीले रंग के प्रसाद का मां को भोग लगाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते है कि इस त्योहार पर पीले रंग का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

बता दें बसंत पंचमी को श्री पंचमी और ज्ञान पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है और इसी दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है, जिन्हें ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की देवी कहा जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसे केवल एक रिवाज नहीं बल्कि प्रकृति, अध्यात्म और विज्ञान से जुड़ा हुआ माना जाता है। आइए जानते हैं कि बसंत पंचमी पर पीला रंग पहनने के पीछे क्या कारण हैं।

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1. पीला रंग और बसंत ऋतु का गहरा संबंध

बसंत ऋतु को ‘ऋतुराज’ कहा गया है क्योंकि यह मौसम खुशहाली, नई शुरुआत और सौंदर्य का प्रतीक होता है। इस समय खेतों में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं, जो प्रकृति में चारों ओर फैली हरियाली और बसंत ऋतु की पहचान बन जाती है। इसी वजह से बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनना प्रकृति के रंगों के साथ जुड़ने और ऋतु के स्वागत का प्रतीक माना जाता है।

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2. मां सरस्वती को प्रिय है पीला रंग

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां सरस्वती को सफेद और पीला रंग अत्यंत प्रिय है। शास्त्रों और चित्रों में देवी को अक्सर हल्के या पीले वस्त्रों में दर्शाया गया है, जो ज्ञान, शांति, सादगी और बुद्धि का प्रतीक हैं।

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3. पीला रंग देता है सकारात्मक ऊर्जा

रंगों का मन और शरीर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। पीला रंग ऊर्जा, उत्साह और सकारात्मक सोच का प्रतीक माना जाता है। यह मस्तिष्क को सक्रिय करता है और मन को प्रसन्न रखता है। इसलिए पीला रंग एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता बढ़ाने में सहायक माना जाता है। इसके साथ पीला रंग पित्त दोष को संतुलित करता है। ये शरीर में गर्माहट और ऊर्जा बनाए रखता है। इसके साथ- साथ सर्दियों के बाद बदलते मौसम में यह रंग शरीर के लिए लाभकारी होता है।

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4. पीले भोजन का विशेष महत्व

इस दिन केवल पीले कपड़े ही नहीं, बल्कि पीले रंग के भोजन बनाने की भी परंपरा है, जैसे- मीठे चावल, केसरिया हलवा, खिचड़ी और सरसों का साग। पीले रंग भोजन शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देते हैं, जो मौसम बदलने के समय उपयोगी होते हैं। साथ ही इन्हें समृद्धि और शुभता का प्रतीक भी माना जाता है।

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बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनना सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म, ऊर्जा और स्वास्थ्य का सुंदर मेल है। इसी कारण इस शुभ दिन पीले वस्त्र धारण करना पवित्र, मंगलकारी और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। Read More VasantPanchami2026: बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनने की परंपरा क्यों है खास? जानिए इसके पाछे के धार्मिक, वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण…

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानिए पीछे की परंपरा, पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व…

BE NEWS – मकर संक्रांति हिंदू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत शुभ पर्व माना जाता है। यह पर्व भगवान सूर्य की उपासना, दान-पुण्य और नई शुरुआत का प्रतीक है।

वर्ष 2026 में मकर संक्रांति 14 तो कई जगहों पर 15 जनवरी को यानि आज मनाई जा रही है। देश के कई हिस्सों में इसे खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घर-घर में खिचड़ी बनाई जाती है, भगवान को भोग लगाया जाता है इसके साथ ही जरूरतमंदों को इसका दान किया जाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस विशेष पर्व पर खिचड़ी का ही इतना महत्व क्यों है?

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बाबा गोरखनाथ से जुड़ी खिचड़ी खाने की परंपरा

मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा बाबा गोरखनाथ से जुड़ी मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, खिलजी के आक्रमण के समय देश में युद्ध का माहौल था। इस संघर्ष में कई योगी और वीर योद्धा भी शामिल थे, जिन्हें भोजन बनाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था। भूख और कमजोरी के कारण उनकी शक्ति क्षीण होने लगी थी।

ऐसे समय में बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह भोजन न केवल जल्दी तैयार होता था, बल्कि शरीर को तुरंत ऊर्जा भी देता था। इसी व्यंजन को ‘खिचड़ी’ नाम दिया गया। तभी से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने और खाने की परंपरा शुरू हुई। आज भी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर भव्य खिचड़ी मेला आयोजित किया जाता है।

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धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और अपने पुत्र शनि देव के घर जाते हैं। इस दिन शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उड़द दाल से बनी खिचड़ी विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। माना जाता है कि इस दिन खिचड़ी का सेवन करने से ग्रहों का शुभ प्रभाव जीवन और स्वास्थ्य पर पड़ता है।

खिचड़ी दान का विशेष महत्व

मकर संक्रांति पर केवल खिचड़ी खाना ही नहीं, बल्कि कच्ची खिचड़ी का दान करना भी अत्यंत पुण्य देने वाला माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन खिचड़ी का दान करने से घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती। साथ ही यह दान सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। मकर संक्रांति का पर्व हमें सरलता, सेवा और समर्पण का संदेश देता है। Read More Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानिए पीछे की परंपरा, पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व…

Prayagraj Magh Mela 2026: प्रयागराज में मकर संक्रांति पर दिखा आस्था का समागम, संगम पर उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब

BE NEWS – आज देशभर में मकर संक्रांति का पावन पर्व मनाया जा रहा है। इसके साथ ही माघ मेला 2026 को आज दूसरा प्रमुख शाही स्नान है, जिसके लिए संगम के पावन तट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किया गया है।

देशभर से आए श्रद्धालु संगम घाटों पर उमड़े

आपको बता दें कि माघ मेला 2026 के दूसरे प्रमुख स्नान पर्व मकर संक्रांति पर प्रयागराज में आस्था का समागम देखने को मिला। गुरुवार सुबह से ही संगम तट पर श्रद्धालुओं, साधु-संतों और कल्पवासियों की भारी भीड़ उमड़ रही है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में पुण्य की डुबकी लगाने के लिए देशभर से आए श्रद्धालु संगम घाटों की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। साधु-संतों, संन्यासियों और कल्पवासियों की मौजूदगी से संगम क्षेत्र पूरी तरह भक्तिमय माहौल में डूबा रहा।

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दो से ढाई करोड़ श्रद्धालुओं के स्नान का अनुमान

मेला प्रशासन के अनुसार, सुबह 10 बजे तक 36 लाख से अधिक श्रद्धालु संगम में स्नान कर चुके थे। अनुमान लगाया जा रहा है कि मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त पूरे दिन रहने के कारण शाम तक स्नान करने वालों की संख्या एक करोड़ के पार पहुंच सकती है। प्रशासन ने इस बार कुल दो से ढाई करोड़ श्रद्धालुओं के स्नान का अनुमान जताया है।

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Makar Sankranti: मकर संक्रांति पर प्रयागराज के संगम में हजारों ...

सुरक्षा और मार्गदर्शन के कड़े इंतजाम

घने कोहरे के बीच श्रद्धालु आस्था के साथ संगम घाटों तक पहुंचे। मौसम को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा और मार्गदर्शन के इंतजाम और कड़े कर दिए। एसपी माघ मेला नीरज पांडे ने बताया कि कोहरे के कारण पुलिस की गश्त बढ़ाई गई है ताकि कोई श्रद्धालु रास्ता न भटके और हर गतिविधि पर सतत निगरानी रखी जा सके।

स्नान घाटों पर विशेष प्रबंध

श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए मेला क्षेत्र में व्यापक इंतजाम किए गए हैं। पुलिस आयुक्त जोगेंद्र कुमार के अनुसार, 24 स्नान घाटों पर विशेष प्रबंध किए गए हैं। सुरक्षा व्यवस्था में पीएसी, बाढ़ राहत पीएसी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आरएएफ, एटीएस, बीडीडीएस सहित हजारों पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। इसके साथ ही यूपी 112 की गाड़ियां, आधुनिक ट्रैफिक कंट्रोल रूम और हाईटेक रिस्पांस प्लान को सक्रिय किया गया है। प्रशासन का कहना है कि श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। Read More Prayagraj Magh Mela 2026: प्रयागराज में मकर संक्रांति पर दिखा आस्था का समागम, संगम पर उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब