Ayodhya Ram Mandir: रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर उमड़ा भक्ति का सैलाब, ‘जय श्रीराम’ उद्घोष से गूंजा अयोध्या का परिसर

Ramlala Pratishtha Divas 2026- अयोध्या में रामलला प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जा रही है। यह वही ऐतिहासिक दिन है, जब 2024 में सदियों की प्रतीक्षा के बाद प्रभु श्रीराम अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए थे। यह अवसर केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हर राम भक्त के लिए आस्था, विश्वास और गौरव का प्रतीक बन चुका है।

रामलला प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ

आपको बता दें कि गुरुवार, 22 जनवरी 2026 का दिन हर राम भक्त के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। इसी दिन अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रीरामलला प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ मनाई जा रही है। इस ऐतिहासिक अवसर पर भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। इस पावन दिन पर अयोध्या में श्रद्धालुओं  के साथ- साथ देश-विदेश से आए भक्त रामलला के दिव्य दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। कोई मंदिर में पहुंचकर प्रभु के चरणों में शीश नवाता है, तो कोई अपने घर में ही विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर इस शुभ दिन को मना रहा है।

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रामलला की दिव्य प्रतिमा

बाल रूप में विराजमान प्रभु श्रीराम का यह स्वरूप ऐसा प्रतीत कराता है मानो वे साक्षात अपने भक्तों को दर्शन दे रहे हों। इस कोमल और दिव्य रूप की पूजा अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती है। रामलला की यह प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित है, जिसे कृष्ण शिला के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि यह पत्थर हजारों वर्षों तक अपनी मजबूती और सौंदर्य बनाए रखता है। इसी विशेष शिला से बनी यह मूर्ति आध्यात्मिक और शिल्प कला का अद्भुत संगम है। शिल्प और विशेषताएं रामलला की इस भव्य मूर्ति का निर्माण कर्नाटक के प्रसिद्ध मूर्तिकार अरुण योगीराज ने किया है। यह प्रतिमा एक ही पत्थर से तराशी गई है, जो इसे और भी विशिष्ट बनाती है।

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भगवान विष्णु के अवतारों का प्रतीकात्मक रूप

जानकारी के अनुसार, मूर्ति का वजन लगभग 200 किलोग्राम है, ऊंचाई 4.24 फीट और चौड़ाई करीब तीन फीट है। इस प्रतिमा की एक और विशेषता यह है कि इसमें भगवान विष्णु के दसों अवतारों का भी प्रतीकात्मक रूप से दर्शन होता है, जो इसे आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। सूर्य तिलक का दिव्य क्षण हर वर्ष रामनवमी के पावन अवसर पर सूर्यदेव स्वयं प्रभु रामलला का ‘सूर्य तिलक’ करते हैं। सूर्य की किरणों से भगवान के मस्तक का यह दिव्य अभिषेक भक्तों के हृदय को भक्ति और आनंद से भर देता है। यह दृश्य न केवल आध्यात्मिक अनुभूति कराता है, बल्कि विज्ञान और परंपरा के अद्भुत समन्वय को भी दर्शाता है।

राम मंदिर का ऐतिहासिक सफर

अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि पर प्राचीन काल से रामलला का मंदिर विद्यमान था, जिसे 16वीं शताब्दी में आक्रमणकारी बाबर द्वारा नष्ट कर दिया गया। इसके बाद लगभग 500 वर्षों तक यह स्थल विवाद और संघर्ष का केंद्र बना रहा। दशकों की कानूनी लड़ाई और सामाजिक आंदोलन के बाद भगवान राम की जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का पुनर्निर्माण संभव हो सका। वर्ष 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा आधुनिक भारत के इतिहास का एक भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण बन गई। रामलला प्रतिष्ठा दिवस 2026 न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आस्था और एकता का एक प्रतीक बन चुका है। Read More Ayodhya Ram Mandir: रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर उमड़ा भक्ति का सैलाब, ‘जय श्रीराम’ उद्घोष से गूंजा अयोध्या का परिसर

Friday Worship Ritual: देवी लक्ष्मी और संतोषी मां की विशेष कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन करें ये उपाय, भूलकर भी न करें ये काम…

Friday Worship Ritual: हिंदु धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी- देवता को समर्पित है। जिसमें से शुक्रवार का दिन देवी लक्ष्मी और संतोषी मां को समर्पित है। कहते है कि इस दिन पूजा करने से घर में सुख- समृद्धि, धन- धान्य की कोई कमी नहीं रहती है।

मां लक्ष्मी और संतोषी को समर्पित शुक्रवार का दिन

आपको बता दें कि शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी और संतोषी को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा से घर में धन, सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। खासतौर पर अगर पूजा सही नियमों के साथ की जाए और कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखा जाए, तो मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

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शुक्रवार की पूजा विधि

शुक्रवार के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ या गुलाबी रंग के वस्त्र पहने चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर या साफ स्थान पर मां लक्ष्मी और संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। मन में श्रद्धा रखते हुए संकल्प लें और पूजा की शुरुआत करें। पूजा के दौरान मां को लाल चुनरी, सिंदूर, चूड़ियां, धूप और घी का दीपक अर्पित करें। भोग में गुड़-चना, खीर या सफेद मिठाई चढ़ाना शुभ माना जाता है। अंत में मां से परिवार की सुख-समृद्धि, धन- धान्य और सौभाग्य की कामना करें।

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शुक्रवार के दिन भूलकर भी न करें ये काम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुछ गलतियां ऐसी हैं जो शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी को अप्रसन्न कर सकती हैं।

1. गंदगी न रखें- शुक्रवार के दिन घर के किसी भी कोने में गंदगी नहीं होनी चाहिए। माना जाता है कि मां लक्ष्मी स्वच्छ स्थान पर ही निवास करती हैं।

2. गंदे या फटे कपड़े न पहनें- इस दिन हमेशा साफ-सुथरे और सलीके वाले वस्त्र पहनें।

3. पैसों का लेन-देन न करें- शुक्रवार को न तो किसी को उधार देना शुभ माना जाता है और न ही उधार लेना।

4. प्रॉपर्टी से जुड़े कार्य टालें- वास्तु शास्त्र के अनुसार, इस दिन जमीन-जायदाद से संबंधित काम करने से बचना चाहिए।

5. रसोई का सामान न खरीदें- मान्यता है कि शुक्रवार को रसोई से जुड़ा सामान खरीदने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं।

अगर आप शुक्रवार के दिन पूरी श्रद्धाभाव के साथ व्रत करते हैं और उसके नियमों के पालन करते हैं तो मां की कृपा आपके जीवन में हमेशा बना रहेगी। घर में सुख- समृद्धि, धन- धान्य और सौभाग्य की कोई कमी नहीं रहती है। Read More Friday Worship Ritual: देवी लक्ष्मी और संतोषी मां की विशेष कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन करें ये उपाय, भूलकर भी न करें ये काम…

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानिए पीछे की परंपरा, पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व…

BE NEWS – मकर संक्रांति हिंदू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत शुभ पर्व माना जाता है। यह पर्व भगवान सूर्य की उपासना, दान-पुण्य और नई शुरुआत का प्रतीक है।

वर्ष 2026 में मकर संक्रांति 14 तो कई जगहों पर 15 जनवरी को यानि आज मनाई जा रही है। देश के कई हिस्सों में इसे खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घर-घर में खिचड़ी बनाई जाती है, भगवान को भोग लगाया जाता है इसके साथ ही जरूरतमंदों को इसका दान किया जाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस विशेष पर्व पर खिचड़ी का ही इतना महत्व क्यों है?

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बाबा गोरखनाथ से जुड़ी खिचड़ी खाने की परंपरा

मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा बाबा गोरखनाथ से जुड़ी मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, खिलजी के आक्रमण के समय देश में युद्ध का माहौल था। इस संघर्ष में कई योगी और वीर योद्धा भी शामिल थे, जिन्हें भोजन बनाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था। भूख और कमजोरी के कारण उनकी शक्ति क्षीण होने लगी थी।

ऐसे समय में बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह भोजन न केवल जल्दी तैयार होता था, बल्कि शरीर को तुरंत ऊर्जा भी देता था। इसी व्यंजन को ‘खिचड़ी’ नाम दिया गया। तभी से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने और खाने की परंपरा शुरू हुई। आज भी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर भव्य खिचड़ी मेला आयोजित किया जाता है।

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धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और अपने पुत्र शनि देव के घर जाते हैं। इस दिन शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उड़द दाल से बनी खिचड़ी विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। माना जाता है कि इस दिन खिचड़ी का सेवन करने से ग्रहों का शुभ प्रभाव जीवन और स्वास्थ्य पर पड़ता है।

खिचड़ी दान का विशेष महत्व

मकर संक्रांति पर केवल खिचड़ी खाना ही नहीं, बल्कि कच्ची खिचड़ी का दान करना भी अत्यंत पुण्य देने वाला माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन खिचड़ी का दान करने से घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती। साथ ही यह दान सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। मकर संक्रांति का पर्व हमें सरलता, सेवा और समर्पण का संदेश देता है। Read More Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानिए पीछे की परंपरा, पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व…

Shattila Ekadashi 2026: षटतिला एकादशी पर पड़ रहा सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग, जानिए इसकी शुभ तिथि, पूजा विधि एंव धार्मिक महत्व…

BE NEWS – हमारे सनातन धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही महत्व है। भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह तिथि बहुत ही शुभ मानी होती है। हिंदू धर्म के अनुसार सालभर में कुल 24 एकादशी होती हैं। प्रत्येक माह में दो एकादशी व्रत आते हैं- एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में।

इसी क्रम में पंचाग के अनुसार माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस बार जनवरी में ये तिथि 13 या 14 कब पड़ रही इसको लेकर लोगों में संशय बना हुआ है। आइये आपको बताते है, इसकी शुभ तिथि और इसके धार्मिक महत्व के बारे में…

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षटतिला एकादशी 2026 की तिथि

वैदिक पंचांग के अनुसार माघ माह की कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि की शुरुआत 13 जनवरी 2026, मंगलवार को दोपहर 3 बजकर 16 मिनट से होगी। वहीं इस तिथि का समापन 14 जनवरी 2026, बुधवार को शाम 5 बजकर 53 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी 2026, बुधवार को रखा जाएगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का संयोग भी बन रहा है, जिससे पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है।

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षटतिला एकादशी की पूजा विधि

षटतिला एकादशी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ कर चौकी स्थापित करें और उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान के समक्ष दीपक और धूप जलाएं। व्रत का संकल्प लें और एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। इस दिन तिल से बने व्यंजन तैयार कर भगवान को भोग अर्पित करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और प्रसाद ग्रहण करें।

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षटतिला एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व

षटतिला एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन तिल का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। षटतिला शब्द में षट का अर्थ छह और तिला का अर्थ तिल होता है। इस एकादशी पर तिल का छह प्रकार से उपयोग किया जाता है, जिसमें तिल का दान, तिल से स्नान, तिल का हवन, तिल से तर्पण, तिल का भोजन और तिल का उबटन शामिल है। मान्यता है कि इन उपायों को करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और जीवन में धन, वैभव और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। Read More Shattila Ekadashi 2026: षटतिला एकादशी पर पड़ रहा सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग, जानिए इसकी शुभ तिथि, पूजा विधि एंव धार्मिक महत्व…

Ekadashi January 2026: जनवरी 2026 में कब-कब रखा जाएगा एकादशी व्रत? जानें तिथि इस व्रत का महत्व और शुभ मुहूर्त

BE NEWS – हमारे सनातन धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही महत्व है। भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह तिथि बहुत ही शुभ मानी होती है। हिंदू धर्म के अनुसार सालभर में कुल 24 एकादशी होती हैं। प्रत्येक माह में दो एकादशी व्रत आते हैं- एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में।

एकादशी तिथि का महत्व

मान्यता है कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के जीवन के कष्ट दूर होते हैं, सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने वाले करने वाले जातक को सभी प्रकार के कष्टों व पापों से मुक्ति मिलती है। साल 2026 की शुरुआत हो चुकी है। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में यह जानने की उत्सुकता है कि जनवरी 2026 में कौन-कौन सी एकादशी आएगी और उनका व्रत कब रखा जाएगा। आइए विस्तार से जानते हैं।

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जनवरी 2026 में पड़ने वाली एकादशी व्रत की सूची

1. षटतिला एकादशी 2026

वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी तिथि आरंभ 13 जनवरी 2026 को दोपहर 03:17 बजे और इसकी समाप्ति 14 जनवरी 2026 को शाम 05:52 बजे होगी। वहीं उदयातिथि के अनुसार 14 जनवरी 2026 को षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन मकर संक्रांति का पर्व भी मनाया जाएगा, जिससे इस तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है। षटतिला एकादशी पर तिल का विशेष महत्व होता है और दान-पुण्य करने से पापों से मुक्ति मिलती है।

तिथि: 14 जनवरी 2026 (बुधवार)
पक्ष: माघ माह, कृष्ण पक्ष

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2. जया एकादशी 2026

माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी तिथि आरंभ 28 जनवरी 2026 को दोपहर 04:35 बजे होगी। जिसकी समाप्ति 29 जनवरी 2026 को दोपहर 01:55 बजे होगी। वहीं उदयातिथि के अनुसार 29 जनवरी 2026 को जया एकादशी का व्रत रखा जाएगा। मान्यता है कि इस व्रत को करने से सभी प्रकार के भय और दोषों से मुक्ति मिलती है तथा आत्मिक शुद्धि होती है।

तिथि: 29 जनवरी 2026 (गुरुवार)
पक्ष: माघ माह, शुक्ल पक्ष

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एकादशी व्रत के दौरान इन बातों का रखें विशेष ध्यान

1. एकादशी के दिन घर और पूजा स्थल की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।

2. इस दिन चावल, अनाज और तामसिक भोजन का सेवन न करें।

3. भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।

4. अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्न, धन, वस्त्र या तिल का दान करें।

5. एकादशी व्रत का पारण हमेशा द्वादशी तिथि को ही करें।

एकादशी व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आत्मसंयम, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाता है। Read More Ekadashi January 2026: जनवरी 2026 में कब-कब रखा जाएगा एकादशी व्रत? जानें तिथि इस व्रत का महत्व और शुभ मुहूर्त

Sakat Chauth Vrat 2026: संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि का पावन पर्व सकट चौथ आज, जानिए कैसे करें पूजा विधि, कथा और इसका धार्मिक महत्व

BE NEWS – सनातन परंपरा में संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए अनेक व्रत-उपवास बताए गए हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत शुभ व फलदायी व्रत है सकट चौथ, जिसे तिलकुट चौथ भी कहा जाता है। यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है और मुख्य रूप से भगवान श्री गणेश एवं चौथ माता की पूजा को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि जो महिलाएं संतान की रक्षा और कल्याण के लिए या संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत करती हैं, उन्हें भगवान गणेश का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

सकट चौथ व्रत का महत्व

दरअसल सकट चौथ का व्रत विशेष रूप से माताओं के लिए माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान के जीवन से संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जल व्रत रखती हैं और रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करती हैं।

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सकट चौथ की पूजा विधि

इस दिन प्रातःकाल स्नान-ध्यान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सफेद तिल और गुड़ से तिलकुट्टा तैयार करें। एक चौकी पर जल का लोटा, रोली, अक्षत (चावल), तिल और तिलकुट्टा रखें और जल के लोटे पर रोली से सतिया बनाएं, और उस पर 13 बिंदियां लगाएं। हाथ में थोड़ा तिलकुट्टा लेकर सकट चौथ की कथा सुनें या पढ़ें। कथा पूर्ण होने के बाद तिलकुट्टा और कुछ रुपये एक कटोरी में रखकर बयना निकालें। यह बयना सास या साके समान किसी स्त्री को पैर छूकर दें। इसके बाद शाम के समय भगवान गणेश और चौथ माता की विधि-विधान से पूजा करें। चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें दूध का अर्घ्य दें, इसके बाद ही व्रत का पारण करें।

सकट चौथ की परंपराएं

इस दिन कई स्थानों पर तिल से बने पहार (पहाड़) को ढंककर रखा जाता है। अगले दिन सुबह पुत्र इसे खोलता है और सिक्के से काटकर सभी भाई-बंधुओं में बांट देता है। कहीं-कहीं तिल से बकरे की आकृति बनाकर उसे दूब या सिक्के से काटने की परंपरा भी है। मान्यता है कि यह परंपरा पशु बलि के स्थान पर प्रतीकात्मक रूप से शुरू की गई थी। इसके बाद सकट चौथ व्रत कथा का पाठ करें। Read More Sakat Chauth Vrat 2026: संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि का पावन पर्व सकट चौथ आज, जानिए कैसे करें पूजा विधि, कथा और इसका धार्मिक महत्व

अयोध्या में प्रतिष्ठा द्वादशी का भव्य उत्सव शुरु, राजनाथ सिंह और सीएम योगी ने किया श्रीराम का पूजन

BE NEWS – अयोध्या आज एक बार फिर ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उल्लास की साक्षी बनने जा रही है। राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ आज श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाई जा रही है। हिंदी पंचांग के अनुसार आज पौष शुक्ल द्वादशी है, जो 22 जनवरी 2024 को हुई प्राण प्रतिष्ठा की तिथि है। इसी शुभ संयोग के कारण आज के दिन को प्रतिष्ठा द्वादशी के रूप में मनाया जा रहा है।

राजनाथ सिंह और सीएम योगी ने किया श्रीराम का पूजन

आज के मुख्य समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। दोनों नेता राम मंदिर पहुंचकर भगवान श्रीराम की पूजन किया और इसके बाद विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेंगे। विशिष्ट अतिथियों की मौजूदगी को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। इसके साथ ही प्रतिष्ठा द्वादशी से जुड़े पांच दिवसीय धार्मिक अनुष्ठानों का आज विधिवत समापन होगा।

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श्रीराम के जयघोष से भक्तिमय वातावरण 

आपको बता दें कि इस विशेष अवसर पर अयोध्या पूरी तरह से सजी-संवरी नजर आ रही है। मंदिरों, सड़कों और प्रमुख चौराहों को फूलों, दीपों और भगवा ध्वजों से सजाया गया है। बीते कई दिनों से ही देश-विदेश से श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था, जबकि आज लाखों भक्तों के रामलला के दर्शन के लिए पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। चारों ओर जय श्रीराम के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठा है।

महाभिषेक के बाद महाआरती

आज भगवान श्रीराम का पंचामृत से विशेष महाभिषेक किया जाएगा। इसके बाद श्रृंगार कर राजभोग अर्पित किया जाएगा। दोपहर 12 बजे महाआरती संपन्न होगी। राजभोग के समय लगभग आधे घंटे के लिए आम श्रद्धालुओं के लिए पट बंद रहेंगे। महाआरती और महाभिषेक का प्रसारण मंदिर परिसर में लगी एलईडी स्क्रीन पर किया जाएगा।

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रामलला का भव्‍य प्राण प्रत‍िष्‍ठा समारोह आज, CM योगी पहुंचे अयोध्‍या

रामकथा पंडाल का आयोजन

दोपहर करीब 1:30 बजे प्रतिष्ठा द्वादशी समारोह का औपचारिक उद्घाटन होगा। इसके साथ ही अंगद टीला परिसर स्थित रामकथा पंडाल में एक विशाल सभा आयोजित की जाएगी, जिसमें संत, धर्माचार्य, जनप्रतिनिधि और अन्य विशिष्ट अतिथि शामिल होंगे। सभा के कारण आज रामकथा का समय ढाई बजे की बजाय साढ़े तीन बजे निर्धारित किया गया है।

मां अन्नपूर्णा मंदिर पर ध्वजारोहण

उत्सव के अंतर्गत परकोटे में स्थित छह मंदिरों में से मां अन्नपूर्णा मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण किया जाएगा। यह ध्वजारोहण रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा पारंपरिक विधि से किया जाएगा। सेना की एक टुकड़ी प्रोटोकॉल के तहत मौके पर मौजूद रहेगी।

अयोध्याधाम में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का पांचवां दिन ...

सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा

आज के कार्यक्रम को देखते हुए अयोध्या को पांच जोन और दस सेक्टर में बांटा गया है। एयरपोर्ट से लेकर राम मंदिर तक कड़ी निगरानी रखी जा रही है। ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी से पूरे क्षेत्र पर नजर रखी जा रही है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल, चिकित्सा सहायता, सूचना केंद्र और विश्राम स्थलों की विशेष व्यवस्था की गई है। बुजुर्गों और दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए अलग मार्ग और सहायता दल तैनात किए गए हैं। Read More अयोध्या में प्रतिष्ठा द्वादशी का भव्य उत्सव शुरु, राजनाथ सिंह और सीएम योगी ने किया श्रीराम का पूजन

अयोध्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे, आज होगा रामलला का अभिषेक, सीएम योगी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रहेंगे उपस्थित

BE NEWS – अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पौष शुक्ल द्वादशी तिथि पर 22 जनवरी 2024 को हुई थी। इस बार यह तिथि 31  दिसंबर यानि आज के दिन पड़ रही है। इसके लिए भव्य तैयारियों का आयोजन किया गया है। इस अवसर पर सीएम योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी उपस्थित रहेंगे।

अयोध्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दो वर्ष

आपको बता दें कि आज 31 दिसंबर दिन बुधवार को पौष शुक्ल द्वादशी तिथि पर अयोध्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे होने वाले है। जिसमें मुख्य अतिथि के तौर पर सीएम योगी आदित्यनाथ व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह उपस्थित होंगे। चार घंटे तक रहकर आयोजित विविध अनुष्ठानों में शामिल होंगे।

अयोध्या : आज फिर राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह की पहली वर्षगांठ ...

अंगद टीला पर जनता को करेंगे संबोधित

प्राण प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ के इस अवसर पर आज रामलला का वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पंचामृत से अभिषेक किया जाएगा। अभिषेक के बाद भव्य श्रृंगार कर भोग अर्पित कर आरती की जाएगी। इस अवसर पर रक्षामंत्री सुबह 11:00 बजे अयोध्या पहुंचेंगे और अन्नपूर्णा मंदिर में ध्वजारोहण करेंगे। इसके बाद रामजन्मभूमि परिसर से सटे अंगद टीला पर जनता को संबोधित करेंगे।

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Shri Ram Lalla Pran-Pratishtha, Shri Ram Janam Bhoomi Ayodhya Dham Ji ...

2 जनवरी तक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम

आज यह वर्षगांठ प्रतिष्ठा द्वादशी के रूप में मनाई जा रही है, जिसके अंतर्गत 29 दिसंबर से 2 जनवरी तक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन किया गया था, जो कि कल दिन मंगलवार को संपन्न हुए। जिसके लिए ट्रस्ट ने इस बार कार्यक्रमों का मुख्य केंद्र रामजन्मभूमि परिसर से सटे अंगद टीला को बनाया था। आज के इस शुभ अवसर पर संत- महात्माओं के साथ बड़ी संख्या में लोग भी इस ऐतिहासिक और गौरवमयी क्षण के साक्षी बनने वाले हैं।

सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा

आज के कार्यक्रम को देखते हुए अयोध्या को पांच जोन और दस सेक्टर में बांटा गया है। एयरपोर्ट से लेकर राम मंदिर तक कड़ी निगरानी रखी जा रही है। ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी से पूरे क्षेत्र पर नजर रखी जा रही है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल, चिकित्सा सहायता, सूचना केंद्र और विश्राम स्थलों की विशेष व्यवस्था की गई है। बुजुर्गों और दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए अलग मार्ग और सहायता दल तैनात किए गए हैं।

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25 दिसंबर को क्यों मनाया जाता है तुलसी पूजन दिवस, जानें कब और कैसै हुई इसकी शुरुआत व धार्मिक महत्व

BE NEWS – हर साल 25 दिसंबर को ईसाईयों का पवित्र क्रिसमस का त्योहार मनाया जाता है। जिसे भारत में भी लोग मनाते हैं। बच्चों के अंदर इस दिन को लेकर खासा उत्साह देखने को मिलता है। जगह- जगह लोग इस दिन को लेकर तैयारियां करते हैं। चर्च से लेकर शॉपिंग मॉल तक में सजावट की जाती है। लेकिन अब हिंदु धर्म में इस दिन को तुलसी पूजन दिवस के रुप में मनाया जाने लगा है। आइये जानें इसके बारे में कब और कैसे इसकी शुरुआत हुई।

आपको बता दें कि हर वर्ष 25 दिसंबर को पूरी दुनिया में ईसाई धर्म का प्रमुख पर्व क्रिसमस मनाया जाता है, जिसे प्रभु यीशु मसीह के जन्मदिवस के रूप में जाना जाता है। भारत में भी यह दिन उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसी के साथ, पिछले कुछ वर्षों से हिंदू समाज में 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में भी मनाया जाने लगा है।

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तुलसी पूजन दिवस की शुरुआत

तुलसी पूजन दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी। देश के साधु-संतों और धर्माचार्यों ने तुलसी के धार्मिक, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक महत्व को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से इस दिन को तुलसी पूजन के लिए समर्पित किया। उनका मानना था कि आधुनिक जीवनशैली में लोग तुलसी जैसे पवित्र और लाभकारी पौधे के महत्व को भूलते जा रहे हैं।

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हिंदू धर्म में तुलसी का महत्व

हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यंत पवित्र माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी के पौधे में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास होता है। इसलिए तुलसी का पूजन करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। यह भी माना जाता है कि तुलसी की नियमित पूजा से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और पारिवारिक जीवन भी सुखमय बना रहता है।

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तुलसी पूजन से होने वाले लाभ

धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसी पूजा करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है, मानसिक तनाव और नकारात्मकता कम होती है।

तुलसी पूजा की विधि

तुलसी पूजन दिवस के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। पूजा की सरल विधि इस प्रकार है- सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तुलसी के पौधे के आसपास साफ-सफाई करें।  गंगाजल छिड़क कर शुद्धिकरण करने के बाद तुलसी जी को जल अर्पित करें। इसके बाद रोली या कुमकुम से तिलक लगाएं फिर लाल चुनरी या वस्त्र अर्पित करें। फूल और माला चढ़ा कर तुलसी के नीचे दीपक जलाएं और फल व मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करें। Read More 25 दिसंबर को क्यों मनाया जाता है तुलसी पूजन दिवस, जानें कब और कैसै हुई इसकी शुरुआत व धार्मिक महत्व