History Of Royal Carriage: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गणतंत्र दिवस पर विदेशी अतिथियों के साथ की शाही बग्घी में सवारी, जानें इसका सालों पुराना इतिहास…
History Of Royal Carriage: 77वें गणतंत्र दिवस समारोह की शुरुआत राष्ट्रपति भवन से होते ही इतिहास की एक झलक नजर आई, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू विदेशी अतिथियों के साथ शाही बग्घी में सवार होकर समारोह स्थल की ओर रवाना हुईं। इस अवसर पर यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेएन भी राष्ट्रपति के साथ मौजूद रहे।
शाही बग्घी का ऐतिहासिक महत्व
आपको बता दें कि गणतंत्र दिवस समारोह में इस्तेमाल होने वाली यह शाही बग्घी सैकड़ों साल पुरानी है। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद 1950 में इस बग्घी में बैठकर समारोह में शामिल हुए थे। इसके पहले, ब्रिटिश वायसराय भी इसे शाही सवारी के रूप में प्रयोग करते थे। बग्घी के किनारों पर सोने की परत लगी हुई है और इसमें राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ को भी सोने के साथ अंकित किया गया है।
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काले रंग की शाही बग्घी और इसकी विशेषताएं
दरअसल इस काले रंग की शाही बग्घी को खास लकड़ी से तैयार किया गया है। इसके पहियों के रिम और अन्य हिस्सों में सोने का इस्तेमाल किया गया है। वर्तमान मूल्य करोड़ों रुपये में आंका जाता है। 100 साल से अधिक पहले कोलकाता की स्टुअर्ट एंड कंपनी ने इसे ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया था। बग्घी को आगे खींचने के लिए छह घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता है, और इसकी सुरक्षा राष्ट्रपति के विशेष अंगरक्षकों द्वारा सुनिश्चित की जाती है।
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इस शाही बग्घी के अधिकार को लेकर निर्णय
भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय इस शाही बग्घी के अधिकार को लेकर निर्णय सिक्का उछालकर किया गया। भारत के दूत एच.एम. पटेल और पाकिस्तान के चौधरी मोहम्मद अली ने इस निर्णय में भाग लिया। सिक्का उछालकर तय हुआ कि बग्घी भारत के पास रहे।
शाही बग्घी का उपयोग बंद
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या के बाद शाही बग्घी का उपयोग बंद कर दिया गया था और इसकी जगह बुलेटप्रूफ कार का इस्तेमाल शुरू हुआ। हालांकि, वर्ष 2014 में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसे पुनः इस्तेमाल किया। उसके बाद से राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी विभिन्न सार्वजनिक समारोहों में इस बग्घी का प्रयोग किया।
गणतंत्र दिवस का भव्य दृश्य
राष्ट्रपति के शाही बग्घी में सवार होने से समारोह की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व और भी बढ़ गया। छह घोड़ों की जोड़ी और सोने की परत वाली बग्घी ने समारोह को ऐतिहासिक और यादगार बना दिया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक, यह बग्घी हमारे गौरवशाली अतीत और आधुनिक भारत के आत्मविश्वास को जोड़ती है। 77वें गणतंत्र दिवस पर छह घोड़ों की टाप और बग्घी की चमक ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत अपनी जड़ों और परंपराओं को सहेजते हुए भविष्य की ओर कदम बढ़ा रहा है। Read More History Of Royal Carriage: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गणतंत्र दिवस पर विदेशी अतिथियों के साथ की शाही बग्घी में सवारी, जानें इसका सालों पुराना इतिहास…