Friday Worship Ritual: देवी लक्ष्मी और संतोषी मां की विशेष कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन करें ये उपाय, भूलकर भी न करें ये काम…

Friday Worship Ritual: हिंदु धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी- देवता को समर्पित है। जिसमें से शुक्रवार का दिन देवी लक्ष्मी और संतोषी मां को समर्पित है। कहते है कि इस दिन पूजा करने से घर में सुख- समृद्धि, धन- धान्य की कोई कमी नहीं रहती है।

मां लक्ष्मी और संतोषी को समर्पित शुक्रवार का दिन

आपको बता दें कि शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी और संतोषी को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा से घर में धन, सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। खासतौर पर अगर पूजा सही नियमों के साथ की जाए और कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखा जाए, तो मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

ये भी देखें: SIR पर बवाल! UP से पश्चिम बंगाल तक सियासी घमासान | 2.89 करोड़ वोटर कटे | BE NEWS

Vaibhav Laxmi Vrat: शुक्रवार को करें वैभव लक्ष्मी व्रत, जानें कब से ...

शुक्रवार की पूजा विधि

शुक्रवार के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ या गुलाबी रंग के वस्त्र पहने चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर या साफ स्थान पर मां लक्ष्मी और संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। मन में श्रद्धा रखते हुए संकल्प लें और पूजा की शुरुआत करें। पूजा के दौरान मां को लाल चुनरी, सिंदूर, चूड़ियां, धूप और घी का दीपक अर्पित करें। भोग में गुड़-चना, खीर या सफेद मिठाई चढ़ाना शुभ माना जाता है। अंत में मां से परिवार की सुख-समृद्धि, धन- धान्य और सौभाग्य की कामना करें।

ये भी देखें: मदरसों पर हाई कोर्ट की बड़ी मुहर, प्रशासन की मनमानी पर रोक | Allahabad HC | BE News

Friday Worship: शुक्रवार के दिन किन देवी-देवताओं की होती है पूजा? जानिए ...

शुक्रवार के दिन भूलकर भी न करें ये काम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुछ गलतियां ऐसी हैं जो शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी को अप्रसन्न कर सकती हैं।

1. गंदगी न रखें- शुक्रवार के दिन घर के किसी भी कोने में गंदगी नहीं होनी चाहिए। माना जाता है कि मां लक्ष्मी स्वच्छ स्थान पर ही निवास करती हैं।

2. गंदे या फटे कपड़े न पहनें- इस दिन हमेशा साफ-सुथरे और सलीके वाले वस्त्र पहनें।

3. पैसों का लेन-देन न करें- शुक्रवार को न तो किसी को उधार देना शुभ माना जाता है और न ही उधार लेना।

4. प्रॉपर्टी से जुड़े कार्य टालें- वास्तु शास्त्र के अनुसार, इस दिन जमीन-जायदाद से संबंधित काम करने से बचना चाहिए।

5. रसोई का सामान न खरीदें- मान्यता है कि शुक्रवार को रसोई से जुड़ा सामान खरीदने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं।

अगर आप शुक्रवार के दिन पूरी श्रद्धाभाव के साथ व्रत करते हैं और उसके नियमों के पालन करते हैं तो मां की कृपा आपके जीवन में हमेशा बना रहेगी। घर में सुख- समृद्धि, धन- धान्य और सौभाग्य की कोई कमी नहीं रहती है। Read More Friday Worship Ritual: देवी लक्ष्मी और संतोषी मां की विशेष कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन करें ये उपाय, भूलकर भी न करें ये काम…

Vastu Shastra: भूलकर भी घर में खाली न छोड़ें ये 5 चीजें, नहीं तो बनी रहेगी कंगाली, जानिए क्या है वास्तु के नियम…

BE NEWS – वास्तु शास्त्र हमारे घर और जीवन की ऊर्जा को संतुलित रखने का बहुत ही प्राचीन तरीका है। कहा जाता है कि हमारे आसपास का वातावरण सीधे हमारे जीवन, धन, स्वास्थ्य और रिश्तों पर असर डालता है। कई बार छोटी-छोटी आदतें भी नकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित कर सकती हैं।

वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में कुछ चीजों को खाली छोड़ना विशेष रूप से अशुभ माना जाता है। आइए जानते हैं उन चीजों के बारे में जिन्हें कभी खाली नहीं रखना चाहिए।

Vastu Tips: वास्तु शास्त्र के अनुसार कैसा होना चाहिए घर का नक्शा ...

1. पर्स में नोट या सिक्का रखना शुभ

वास्तु के अनुसार, पर्स और तिजोरी में हमेशा कुछ न कुछ धन होना चाहिए। पर्स में कम से कम एक नोट या सिक्का रखना शुभ होता है। वहीं, तिजोरी में भी पैसे या कोई कीमती वस्तु जरूर रखें। ऐसा करने से धन का प्रवाह बना रहता है और आर्थिक स्थिति मजबूत रहती है।

घर में रखी इन चीजों को कभी न छोड़ें खाली, बन सकती हैं वास्तु दोष का ...

2. कभी खाली न छोड़ें मंदिर का जल पात्र

घर के मंदिर या पूजा स्थल में रखे जल पात्र को कभी खाली न छोड़ें। इसमें रोज ताजा पानी डालें और चाहें तो फूल या आम के पत्ते भी डाल सकते हैं। ऐसा करने से पूजा का प्रभाव बढ़ता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

ये भी देखें – अपर्णा यादव से तलाक लेंगे प्रतीक यादव? | मुलायम परिवार में बड़ा विवाद | BE NEWS

Vastu Tips in Hindi Which things should never be kept empty in the ...

3. बाल्टी या लोटा खाली रखना अशुभ

बाथरूम में बाल्टी या लोटा खाली रखना शुभ नहीं माना जाता। वास्तु शास्त्र के अनुसार, खाली बाल्टी मानसिक अशांति और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकती है। इसलिए हमेशा इसमें थोड़ा पानी भरा रखें।

क्या बाथरूम में खाली बाल्टी रख सकते हैं? जानिए किस रंग की बाल्टी का ...

4. अन्नपूर्णा का स्थान रसोई का अनाज पात्र

रसोई को मां अन्नपूर्णा का स्थान माना जाता है। इसलिए अनाज का पात्र कभी खाली न छोड़ें। समय-समय पर नया अनाज डालते रहें। यह घर में समृद्धि, खुशहाली और परिवारिक सुख को बनाए रखने में मदद करता है।

जानें क्या है मोटा अनाज, सरकार क्यों दे रही है इसे बढ़ावा - Know what ...

5. कभी भी किसी का अपमान न करें

वास्तु शास्त्र में यह भी बताया गया है कि हमारे शब्द हमारे जीवन पर बड़ा असर डालते हैं। कभी भी किसी का अपमान न करें, खासकर घर के बड़े-बुजुर्गों से। गलत या कठोर शब्दों से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं और घर में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है। हमेशा सोच-समझकर और प्यार से बोलें।

इन छोटी-छोटी वास्तु आदतों का पालन करके आप अपने घर में धन, स्वास्थ्य और खुशहाली को बनाए रख सकते हैं। पर्स, पूजा स्थल, रसोई, बाथरूम और अपने शब्दों का सही इस्तेमाल करके नकारात्मक ऊर्जा से बचा जा सकता है। Read More Vastu Shastra: भूलकर भी घर में खाली न छोड़ें ये 5 चीजें, नहीं तो बनी रहेगी कंगाली, जानिए क्या है वास्तु के नियम…

शिवलिंग पर जल अर्पण के समय किन तीन पवित्र स्थानों के स्पर्श करना है अत्यंत शुभ, जानिए उसका आध्यात्मिक महत्व…

BE NEWS – हिंदू सनातन धर्म में देवों को देव महादेव को विशेष स्थान दिया गया है। उनको प्रसन्न करना बहुत ही आसान है। जिन पर उनकी कृपा हो जाए उसके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। कहते है शिवलिंग पर अगर एक लोटा जल भी अर्पित करने मात्र से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। उनकी शिवलिंग के स्पर्श मात्र से भी हर तरह के कष्टों से निजात मिलती हैं। ऐसे में जल चढ़ाने से लेकर शिवलिंग को स्पर्श करने तक कई नियम बताए गये हैं, जिनके बारे में आपको पता होना जरुरी है।

पवित्र स्थानों को स्पर्श और उनके आध्यात्मिक महत्व

आज हम आपको बताते है कि शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग पर सीधे जल चढ़ाने से पहले कुछ विशेष स्थानों का स्पर्श और पूजन करना अत्यंत शुभ माना गया है। जिनके स्पर्श करने मात्र से भय, रोग और कुंडली दोषों से निजात मिलती है और जीवन व विवाह संबधी समस्याएं भी दूर हो जाती है। आइए जानते हैं उन तीन पवित्र स्थानों और उनके आध्यात्मिक महत्व के बारे में।

दाम्पत्य जीवन में मिठास के लिए सावन में शिवलिंग पर चढ़ाएं यह वस्तु, ऐसे ...

शिवलिंग का आध्यात्मिक स्वरूप

शिवलिंग केवल भगवान शिव का प्रतीक नहीं है। जिसमें भगवान भोलेनाथ का पूरा परिवार वास करता है।  बल्कि इसमें माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और पुत्री अशोक सुंदरी का भी वास माना गया है। इसलिए जल अर्पण करते समय श्रद्धा और विधि का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय का स्थान

शिवलिंग के अग्र भाग में दाईं और बाईं ओर जो स्थान होता है, वहां भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय विराजमान माने जाते हैं। सबसे पहले इन दोनों स्थानों को अपने हाथों से स्पर्श करें। यहां जल अर्पित करें और 5 से 7 बार हल्के हाथों से दबाएं। इस दौरान शिव मंत्रों का जाप करें। ऐसा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और बच्चों से जुड़ी परेशानियां व रोग दूर होने की मान्यता है।

ये भी देखें – Prayagraj Magh Mela 2026: प्रयागराज में माघ मेले को लेकर नगर आयुक्त से खास बातचीत | BE News

शिव परिवार की पूजा किस विधि से करनी चाहिए? | shiv parivar puja vidhi ...

दूसरा अशोक सुंदरी का स्थान

शिव पुराण के अनुसार, शिवलिंग के मध्य भाग, जहां से जल प्रवाहित होता है, वहां भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी का वास माना गया है। इस स्थान पर पहले बेलपत्र अर्पित करें। फिर इस स्थान को स्पर्श करते हुए जल चढ़ाएं। मन ही मन अपनी इच्छा भगवान शिव के सामने रखें। इस विधि से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और मांगलिक दोष से राहत मिलती है।

प्रदीप मिश्रा जी का सात लौटे जल वाला उपाय कैसे करें – BholenathBhakti

तीसरा माता पार्वती का स्थान

शिवलिंग के चारों ओर बने गोल आधार (जलहरी) में माता पार्वती का वास माना जाता है। सबसे पहले इस स्थान को श्रद्धा से स्पर्श करें। फिर यहां जल अर्पित करें। मान्यता है कि इससे शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है और गंभीर बीमारियों में भी लाभ प्राप्त होता है।

अंत में जल अर्पित करें

इन तीनों पवित्र स्थानों का स्पर्श और पूजन करने के बाद अंत में पूरे शिवलिंग पर जल अर्पित करें। ऐसा करने से पूजा संपूर्ण मानी जाती है और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। Read More शिवलिंग पर जल अर्पण के समय किन तीन पवित्र स्थानों के स्पर्श करना है अत्यंत शुभ, जानिए उसका आध्यात्मिक महत्व…

VasantPanchami2026: बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनने की परंपरा क्यों है खास? जानिए इसके पाछे के धार्मिक, वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण…

BE NEWS – बसंत पंचमी का त्योहार मां सरस्वती की पूजा को समर्पित होता है। इस दिन सभी लोग देवी मां की आराधना  करते है। परम्परा के अनुसार इस दिन पर पीले वस्त्र पहने जाते है, पीले रंग के प्रसाद का मां को भोग लगाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते है कि इस त्योहार पर पीले रंग का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

बता दें बसंत पंचमी को श्री पंचमी और ज्ञान पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है और इसी दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है, जिन्हें ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की देवी कहा जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसे केवल एक रिवाज नहीं बल्कि प्रकृति, अध्यात्म और विज्ञान से जुड़ा हुआ माना जाता है। आइए जानते हैं कि बसंत पंचमी पर पीला रंग पहनने के पीछे क्या कारण हैं।

इन राज्यों में बेहद खास होता है बसंत पंचमी का सेलिब्रेशन, जानिए अलग-अलग ...

1. पीला रंग और बसंत ऋतु का गहरा संबंध

बसंत ऋतु को ‘ऋतुराज’ कहा गया है क्योंकि यह मौसम खुशहाली, नई शुरुआत और सौंदर्य का प्रतीक होता है। इस समय खेतों में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं, जो प्रकृति में चारों ओर फैली हरियाली और बसंत ऋतु की पहचान बन जाती है। इसी वजह से बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनना प्रकृति के रंगों के साथ जुड़ने और ऋतु के स्वागत का प्रतीक माना जाता है।

Welcoming spring with yellow mustard flowers, farming in 14 thousand ...

2. मां सरस्वती को प्रिय है पीला रंग

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां सरस्वती को सफेद और पीला रंग अत्यंत प्रिय है। शास्त्रों और चित्रों में देवी को अक्सर हल्के या पीले वस्त्रों में दर्शाया गया है, जो ज्ञान, शांति, सादगी और बुद्धि का प्रतीक हैं।

Saraswati Puja 2021: मां सरस्वती को प्रिय हैं ये चीजें, जानें क्या होनी ...

3. पीला रंग देता है सकारात्मक ऊर्जा

रंगों का मन और शरीर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। पीला रंग ऊर्जा, उत्साह और सकारात्मक सोच का प्रतीक माना जाता है। यह मस्तिष्क को सक्रिय करता है और मन को प्रसन्न रखता है। इसलिए पीला रंग एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता बढ़ाने में सहायक माना जाता है। इसके साथ पीला रंग पित्त दोष को संतुलित करता है। ये शरीर में गर्माहट और ऊर्जा बनाए रखता है। इसके साथ- साथ सर्दियों के बाद बदलते मौसम में यह रंग शरीर के लिए लाभकारी होता है।

बसंत पंचमी के दिन क्यों पहने जाते हैं पीले वस्त्र? - why-are-yellow ...

4. पीले भोजन का विशेष महत्व

इस दिन केवल पीले कपड़े ही नहीं, बल्कि पीले रंग के भोजन बनाने की भी परंपरा है, जैसे- मीठे चावल, केसरिया हलवा, खिचड़ी और सरसों का साग। पीले रंग भोजन शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देते हैं, जो मौसम बदलने के समय उपयोगी होते हैं। साथ ही इन्हें समृद्धि और शुभता का प्रतीक भी माना जाता है।

बसंत पंचमी पर बनाएं पीले रंग का स्वादिष्ट रवा केसरी और लगाएं भोग, झटपट ...

बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनना सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म, ऊर्जा और स्वास्थ्य का सुंदर मेल है। इसी कारण इस शुभ दिन पीले वस्त्र धारण करना पवित्र, मंगलकारी और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। Read More VasantPanchami2026: बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनने की परंपरा क्यों है खास? जानिए इसके पाछे के धार्मिक, वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण…

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानिए पीछे की परंपरा, पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व…

BE NEWS – मकर संक्रांति हिंदू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत शुभ पर्व माना जाता है। यह पर्व भगवान सूर्य की उपासना, दान-पुण्य और नई शुरुआत का प्रतीक है।

वर्ष 2026 में मकर संक्रांति 14 तो कई जगहों पर 15 जनवरी को यानि आज मनाई जा रही है। देश के कई हिस्सों में इसे खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घर-घर में खिचड़ी बनाई जाती है, भगवान को भोग लगाया जाता है इसके साथ ही जरूरतमंदों को इसका दान किया जाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस विशेष पर्व पर खिचड़ी का ही इतना महत्व क्यों है?

Smoked Panchmel Dal: This Unique Dal Recipe Will Elevate Your Daily ...

बाबा गोरखनाथ से जुड़ी खिचड़ी खाने की परंपरा

मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा बाबा गोरखनाथ से जुड़ी मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, खिलजी के आक्रमण के समय देश में युद्ध का माहौल था। इस संघर्ष में कई योगी और वीर योद्धा भी शामिल थे, जिन्हें भोजन बनाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था। भूख और कमजोरी के कारण उनकी शक्ति क्षीण होने लगी थी।

ऐसे समय में बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह भोजन न केवल जल्दी तैयार होता था, बल्कि शरीर को तुरंत ऊर्जा भी देता था। इसी व्यंजन को ‘खिचड़ी’ नाम दिया गया। तभी से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने और खाने की परंपरा शुरू हुई। आज भी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर भव्य खिचड़ी मेला आयोजित किया जाता है।

ये भी देखें- Makar Sankranti 2026: Gorakhpur से संगम तक श्रद्धा का सैलाब | BE News| Magh Mela 2026

Makar Sankranti 2023: इस मकर संक्रांति पर बन रहा ऐसा अद्भुत योग, खिचड़ी ...

धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और अपने पुत्र शनि देव के घर जाते हैं। इस दिन शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उड़द दाल से बनी खिचड़ी विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। माना जाता है कि इस दिन खिचड़ी का सेवन करने से ग्रहों का शुभ प्रभाव जीवन और स्वास्थ्य पर पड़ता है।

खिचड़ी दान का विशेष महत्व

मकर संक्रांति पर केवल खिचड़ी खाना ही नहीं, बल्कि कच्ची खिचड़ी का दान करना भी अत्यंत पुण्य देने वाला माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन खिचड़ी का दान करने से घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती। साथ ही यह दान सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। मकर संक्रांति का पर्व हमें सरलता, सेवा और समर्पण का संदेश देता है। Read More Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानिए पीछे की परंपरा, पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व…

Lohri 2026: देशभर में आज मनाया जा रहा है लोहड़ी का पर्व, आइए जानें क्यों खास है ये त्योहार, इसकी शुभ तिथि व ऐतिहािसक महत्व

BE NEWS – उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और आसपास के क्षेत्रों में लोहड़ी का पर्व सर्दियों की विदाई और नई ऋतु के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। अलाव की गर्माहट, लोकगीतों की गूंज और सामूहिक उल्लास के साथ मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और समाज के आपसी संबंधों का उत्सव है। हर वर्ष मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है।

2026 में कब मनाई जाएगी लोहड़ी

आज 13 जनवरी, दिन मंगलवार को देशभर में लोहड़ी को त्योहार मनाया जा रहा है। यह दिन सूर्य के उत्तरायण होने से पहले की आखिरी रात को दर्शाता है और शीत ऋतु के धीरे-धीरे समाप्त होने का संकेत देता है।

ये भी देखें-Meerut में Sonu Kashyap उर्फ रोनू की जिंदा जलाकर हत्या | BE News

लोहड़ी पर्व क्यों मनाया जाता है? | लोहड़ी माता की कथा एवं पौराणिक घटना पढ़े

 क्यों मनाई जाती है लोहड़ी

लोहड़ी के इस पर्व का संबंध सूर्य, अग्नि और फसल से जुड़ा हुआ है। किसान समुदाय के लिए यह पर्व खास महत्व रखता है क्योंकि इसी समय रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, खेतों में पकने लगती है। अलाव के चारों ओर तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और पॉपकॉर्न अर्पित कर प्रकृति और अग्नि देवता के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। यह परंपरा अच्छी फसल और समृद्धि की कामना का प्रतीक है।

लोहड़ी का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व

लोहड़ी का इतिहास पंजाब के लोकनायक दुल्ला भट्टी, जिन्हें ‘पंजाब का रॉबिनहुड’ कहा जाता है, से जुड़ा है। उन्होंने अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया और जरूरतमंद परिवारों, खासकर बेटियों के विवाह में सहायता की। लोहड़ी के पारंपरिक गीतों में आज भी दुल्ला भट्टी का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

Happy Lohri 2024 Punjabi Boliyan Lyrics: Sundar Mundariye, Aaya Lohri ...

लोहड़ी का सांस्कृतिक महत्व

लोहड़ी नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए विशेष महत्व रखती है। भांगड़ा, गिद्धा, ढोल की थाप और सामूहिक नृत्य इस उत्सव को जीवंत बना देते हैं। यह पर्व सामूहिकता, भाईचारे और साझा खुशी का संदेश देता है।

लोहड़ी का संदेश

लोहड़ी हमें यह सिखाती है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी अपनी जड़ों और परंपराओं को नहीं भूलना चाहिए। अलाव की आग केवल ठंड नहीं मिटाती, बल्कि लोगों को एक-दूसरे के करीब लाती है और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक सेतु का काम करती है। Read More Lohri 2026: देशभर में आज मनाया जा रहा है लोहड़ी का पर्व, आइए जानें क्यों खास है ये त्योहार, इसकी शुभ तिथि व ऐतिहािसक महत्व

Ekadashi January 2026: जनवरी 2026 में कब-कब रखा जाएगा एकादशी व्रत? जानें तिथि इस व्रत का महत्व और शुभ मुहूर्त

BE NEWS – हमारे सनातन धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही महत्व है। भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह तिथि बहुत ही शुभ मानी होती है। हिंदू धर्म के अनुसार सालभर में कुल 24 एकादशी होती हैं। प्रत्येक माह में दो एकादशी व्रत आते हैं- एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में।

एकादशी तिथि का महत्व

मान्यता है कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के जीवन के कष्ट दूर होते हैं, सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने वाले करने वाले जातक को सभी प्रकार के कष्टों व पापों से मुक्ति मिलती है। साल 2026 की शुरुआत हो चुकी है। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में यह जानने की उत्सुकता है कि जनवरी 2026 में कौन-कौन सी एकादशी आएगी और उनका व्रत कब रखा जाएगा। आइए विस्तार से जानते हैं।

Nirjala Ekadashi 2025: निर्जला एकादशी व्रत में शाम को क्या खाना चाहिए ...

जनवरी 2026 में पड़ने वाली एकादशी व्रत की सूची

1. षटतिला एकादशी 2026

वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी तिथि आरंभ 13 जनवरी 2026 को दोपहर 03:17 बजे और इसकी समाप्ति 14 जनवरी 2026 को शाम 05:52 बजे होगी। वहीं उदयातिथि के अनुसार 14 जनवरी 2026 को षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन मकर संक्रांति का पर्व भी मनाया जाएगा, जिससे इस तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है। षटतिला एकादशी पर तिल का विशेष महत्व होता है और दान-पुण्य करने से पापों से मुक्ति मिलती है।

तिथि: 14 जनवरी 2026 (बुधवार)
पक्ष: माघ माह, कृष्ण पक्ष

ये भी देखें –ED Raid के बीच Pratik Jain के घर पहुंचीं CM Mamata Banerjee | BE News

Ekadashi Vrat 2026: षटतिला एकादशी व्रत कब है 13 या 14 जनवरी ...

2. जया एकादशी 2026

माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी तिथि आरंभ 28 जनवरी 2026 को दोपहर 04:35 बजे होगी। जिसकी समाप्ति 29 जनवरी 2026 को दोपहर 01:55 बजे होगी। वहीं उदयातिथि के अनुसार 29 जनवरी 2026 को जया एकादशी का व्रत रखा जाएगा। मान्यता है कि इस व्रत को करने से सभी प्रकार के भय और दोषों से मुक्ति मिलती है तथा आत्मिक शुद्धि होती है।

तिथि: 29 जनवरी 2026 (गुरुवार)
पक्ष: माघ माह, शुक्ल पक्ष

ये भी देखें – Today Breaking News ! आज 05 जनवरी 2026 के मुख्य समाचार बड़ी खबरें | TOP 25 | BE News

Aditi Vrat - Fasting Festival - Temple Yatri

एकादशी व्रत के दौरान इन बातों का रखें विशेष ध्यान

1. एकादशी के दिन घर और पूजा स्थल की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।

2. इस दिन चावल, अनाज और तामसिक भोजन का सेवन न करें।

3. भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।

4. अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्न, धन, वस्त्र या तिल का दान करें।

5. एकादशी व्रत का पारण हमेशा द्वादशी तिथि को ही करें।

एकादशी व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आत्मसंयम, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाता है। Read More Ekadashi January 2026: जनवरी 2026 में कब-कब रखा जाएगा एकादशी व्रत? जानें तिथि इस व्रत का महत्व और शुभ मुहूर्त

Sakat Chauth Vrat 2026: संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि का पावन पर्व सकट चौथ आज, जानिए कैसे करें पूजा विधि, कथा और इसका धार्मिक महत्व

BE NEWS – सनातन परंपरा में संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए अनेक व्रत-उपवास बताए गए हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत शुभ व फलदायी व्रत है सकट चौथ, जिसे तिलकुट चौथ भी कहा जाता है। यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है और मुख्य रूप से भगवान श्री गणेश एवं चौथ माता की पूजा को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि जो महिलाएं संतान की रक्षा और कल्याण के लिए या संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत करती हैं, उन्हें भगवान गणेश का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

सकट चौथ व्रत का महत्व

दरअसल सकट चौथ का व्रत विशेष रूप से माताओं के लिए माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान के जीवन से संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जल व्रत रखती हैं और रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करती हैं।

ये भी देखें- JNU में PM Modi और Amit Shah के खिलाफ विवादित नारे लगे। | BE News

Sakat Chauth पर गणपति बप्पा को लगाएं अपने हाथों से बने तिलकुट का भोग ...

सकट चौथ की पूजा विधि

इस दिन प्रातःकाल स्नान-ध्यान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सफेद तिल और गुड़ से तिलकुट्टा तैयार करें। एक चौकी पर जल का लोटा, रोली, अक्षत (चावल), तिल और तिलकुट्टा रखें और जल के लोटे पर रोली से सतिया बनाएं, और उस पर 13 बिंदियां लगाएं। हाथ में थोड़ा तिलकुट्टा लेकर सकट चौथ की कथा सुनें या पढ़ें। कथा पूर्ण होने के बाद तिलकुट्टा और कुछ रुपये एक कटोरी में रखकर बयना निकालें। यह बयना सास या साके समान किसी स्त्री को पैर छूकर दें। इसके बाद शाम के समय भगवान गणेश और चौथ माता की विधि-विधान से पूजा करें। चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें दूध का अर्घ्य दें, इसके बाद ही व्रत का पारण करें।

सकट चौथ की परंपराएं

इस दिन कई स्थानों पर तिल से बने पहार (पहाड़) को ढंककर रखा जाता है। अगले दिन सुबह पुत्र इसे खोलता है और सिक्के से काटकर सभी भाई-बंधुओं में बांट देता है। कहीं-कहीं तिल से बकरे की आकृति बनाकर उसे दूब या सिक्के से काटने की परंपरा भी है। मान्यता है कि यह परंपरा पशु बलि के स्थान पर प्रतीकात्मक रूप से शुरू की गई थी। इसके बाद सकट चौथ व्रत कथा का पाठ करें। Read More Sakat Chauth Vrat 2026: संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि का पावन पर्व सकट चौथ आज, जानिए कैसे करें पूजा विधि, कथा और इसका धार्मिक महत्व

Year 2026: आपके लिए लाए हैं हम साल 2026 का कैलेंडर, यहां देखें आने वाले प्रमुख व्रत-त्योहारों की पूरी सूची

BE NEWS: दिसंबर के खत्म होने के साथ ही नए साल 2026 की शुरुआत हो जायेगी। ऐसे में आने वाले साल को लेकर हम सभी ये जानने के लिए उत्सुक हो जाते है कि कब और किस दिन कौन-सा व्रत व त्योहार मनाया जाएगा। भारत में व्रत और त्योहार न सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़े होते हैं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी इनका विशेष महत्व होता है।

ऐसे में अगर आप साल 2026 के लिए पहले से ही यात्रा, पूजा-पाठ या अन्य शुभ कार्यों की योजना बनाना चाहते हैं, तो यहां हम आपके लिए हिंदू कैलेंडर 2026 के अनुसार प्रमुख व्रत और त्योहारों को बताने जा रहे हैं। देखें मकर संक्राति से लेकर दीपावली तक पड़ने वाले प्रमुख व्रत-त्योहारों की पूरी सूची….

January 2023 Vrat And Tyohar Know Sakat Chauth, Vasant Panchami, Lohri ...

ये भी देखे: Today Breaking News ! आज 13 दिसंबर 2025 के मुख्य समाचार बड़ी खबरें | आज की 25 बड़ी खबरें | BE NEWS Read More Year 2026: आपके लिए लाए हैं हम साल 2026 का कैलेंडर, यहां देखें आने वाले प्रमुख व्रत-त्योहारों की पूरी सूची

नववर्ष 2026 की शुरुआत पर बन रहा गुरु प्रदोष व्रत का दुर्लभ संयोग, शिव कृपा पाने के लिए करें ये विशेष उपाय

BE NEWS – इस बार नए साल 2026 का आगाज गुरुवार के दिन हो रहा है। इसके साथ गुरु प्रदोष व्रत भी पड़ रहा है। जोकि एक दुर्लभ संयोग के साथ बेहद शुभ योग भी है। भगवान शिव को समर्पित यह व्रत विशेष फल देने वाला है।

भगवान शिव की विशेष कृपा

आपको बता दें कि हिंदू पंचांग के अनुसार, 1 जनवरी 2026, गुरुवार को नए साल की शुरुआत के साथ ही गुरु प्रदोष व्रत का महायोग बन रहा है। यह दिन भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए बहुत फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष व्रत के दिन विधि-विधान से महादेव की पूजा करने से जीवन के कष्ट, मानसिक तनाव और ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है। चूंकि यह प्रदोष व्रत गुरुवार को पड़ रहा है, इसलिए इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा, जो विशेष रूप से सुख, सौभाग्य, ज्ञान और समृद्धि प्रदान करने वाला माना गया है।

Guru Pradosh Vrat 2023: गुरु प्रदोष व्रत की पूजा का महाउपाय, जिसे करते ...

तिथि और शुभ मुहूर्त

गुरु प्रदोष व्रत 2026, 1 जनवरी 2026, दिन गुरुवार को त्रयोदशी को हो रहा है। पूजा का समय प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) है। प्रदोष काल में की गई शिव पूजा का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इस समय भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न माने जाते हैं।

ये भी देखें- New Year पर स्टंटबाजों की खैर नहीं, पुलिस हुई अलर्ट | BE NEWS

January Pradosh Vrat 2025: नए साल के पहले प्रदोष व्रत पर भगवान शिव के ...

व्रत के दिन भूलकर भी न करें ये गलतियां

शास्त्रों में प्रदोष व्रत के दिन कुछ कार्यों को वर्जित बताया गया है। इनसे बचने पर ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है-

1. तामसिक भोजन से परहेज करें: इस दिन लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का सेवन न करें, भले ही नववर्ष का उत्सव क्यों न हो।

2. क्रोध और कलह से बचें: घर में शांति बनाए रखें। किसी से झगड़ा, अपशब्द या बड़ों का अपमान गुरु दोष का कारण बन सकता है।

3.स्नान और ध्यान: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और शिव जी का ध्यान करें।

4.पूजा में वर्जित वस्तुएं न चढ़ाएं: शिव पूजा में केतकी पुष्प, तुलसी दल और सिंदूर का प्रयोग न करें। इसके साथ ही काले रंग से बचें। पीले या सफेद वस्त्र शुभ माने जाते हैं।

गुरु प्रदोष व्रत पर करने वाले विशेष उपाय

प्रदोष काल के समय शिव पूजा अवश्य करें। दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें। गुरुवार होने के कारण पीली वस्तुओं जैसे- चने की दाल, हल्दी या पीले फल का दान करना शुभ फल देता है और आर्थिक तंगी दूर करता है। भगवान शिव की आराधना करने से कुंडली में मौजूद अशुभ ग्रहों का प्रभाव कम होता है। विशेष रूप से शनिदेव, राहु और केतु की कृपा प्राप्त होती है। Read More नववर्ष 2026 की शुरुआत पर बन रहा गुरु प्रदोष व्रत का दुर्लभ संयोग, शिव कृपा पाने के लिए करें ये विशेष उपाय