Vastu Shastra: भूलकर भी घर में खाली न छोड़ें ये 5 चीजें, नहीं तो बनी रहेगी कंगाली, जानिए क्या है वास्तु के नियम…

BE NEWS – वास्तु शास्त्र हमारे घर और जीवन की ऊर्जा को संतुलित रखने का बहुत ही प्राचीन तरीका है। कहा जाता है कि हमारे आसपास का वातावरण सीधे हमारे जीवन, धन, स्वास्थ्य और रिश्तों पर असर डालता है। कई बार छोटी-छोटी आदतें भी नकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित कर सकती हैं।

वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में कुछ चीजों को खाली छोड़ना विशेष रूप से अशुभ माना जाता है। आइए जानते हैं उन चीजों के बारे में जिन्हें कभी खाली नहीं रखना चाहिए।

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1. पर्स में नोट या सिक्का रखना शुभ

वास्तु के अनुसार, पर्स और तिजोरी में हमेशा कुछ न कुछ धन होना चाहिए। पर्स में कम से कम एक नोट या सिक्का रखना शुभ होता है। वहीं, तिजोरी में भी पैसे या कोई कीमती वस्तु जरूर रखें। ऐसा करने से धन का प्रवाह बना रहता है और आर्थिक स्थिति मजबूत रहती है।

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2. कभी खाली न छोड़ें मंदिर का जल पात्र

घर के मंदिर या पूजा स्थल में रखे जल पात्र को कभी खाली न छोड़ें। इसमें रोज ताजा पानी डालें और चाहें तो फूल या आम के पत्ते भी डाल सकते हैं। ऐसा करने से पूजा का प्रभाव बढ़ता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

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3. बाल्टी या लोटा खाली रखना अशुभ

बाथरूम में बाल्टी या लोटा खाली रखना शुभ नहीं माना जाता। वास्तु शास्त्र के अनुसार, खाली बाल्टी मानसिक अशांति और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकती है। इसलिए हमेशा इसमें थोड़ा पानी भरा रखें।

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4. अन्नपूर्णा का स्थान रसोई का अनाज पात्र

रसोई को मां अन्नपूर्णा का स्थान माना जाता है। इसलिए अनाज का पात्र कभी खाली न छोड़ें। समय-समय पर नया अनाज डालते रहें। यह घर में समृद्धि, खुशहाली और परिवारिक सुख को बनाए रखने में मदद करता है।

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5. कभी भी किसी का अपमान न करें

वास्तु शास्त्र में यह भी बताया गया है कि हमारे शब्द हमारे जीवन पर बड़ा असर डालते हैं। कभी भी किसी का अपमान न करें, खासकर घर के बड़े-बुजुर्गों से। गलत या कठोर शब्दों से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं और घर में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है। हमेशा सोच-समझकर और प्यार से बोलें।

इन छोटी-छोटी वास्तु आदतों का पालन करके आप अपने घर में धन, स्वास्थ्य और खुशहाली को बनाए रख सकते हैं। पर्स, पूजा स्थल, रसोई, बाथरूम और अपने शब्दों का सही इस्तेमाल करके नकारात्मक ऊर्जा से बचा जा सकता है। Read More Vastu Shastra: भूलकर भी घर में खाली न छोड़ें ये 5 चीजें, नहीं तो बनी रहेगी कंगाली, जानिए क्या है वास्तु के नियम…

शिवलिंग पर जल अर्पण के समय किन तीन पवित्र स्थानों के स्पर्श करना है अत्यंत शुभ, जानिए उसका आध्यात्मिक महत्व…

BE NEWS – हिंदू सनातन धर्म में देवों को देव महादेव को विशेष स्थान दिया गया है। उनको प्रसन्न करना बहुत ही आसान है। जिन पर उनकी कृपा हो जाए उसके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। कहते है शिवलिंग पर अगर एक लोटा जल भी अर्पित करने मात्र से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। उनकी शिवलिंग के स्पर्श मात्र से भी हर तरह के कष्टों से निजात मिलती हैं। ऐसे में जल चढ़ाने से लेकर शिवलिंग को स्पर्श करने तक कई नियम बताए गये हैं, जिनके बारे में आपको पता होना जरुरी है।

पवित्र स्थानों को स्पर्श और उनके आध्यात्मिक महत्व

आज हम आपको बताते है कि शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग पर सीधे जल चढ़ाने से पहले कुछ विशेष स्थानों का स्पर्श और पूजन करना अत्यंत शुभ माना गया है। जिनके स्पर्श करने मात्र से भय, रोग और कुंडली दोषों से निजात मिलती है और जीवन व विवाह संबधी समस्याएं भी दूर हो जाती है। आइए जानते हैं उन तीन पवित्र स्थानों और उनके आध्यात्मिक महत्व के बारे में।

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शिवलिंग का आध्यात्मिक स्वरूप

शिवलिंग केवल भगवान शिव का प्रतीक नहीं है। जिसमें भगवान भोलेनाथ का पूरा परिवार वास करता है।  बल्कि इसमें माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और पुत्री अशोक सुंदरी का भी वास माना गया है। इसलिए जल अर्पण करते समय श्रद्धा और विधि का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय का स्थान

शिवलिंग के अग्र भाग में दाईं और बाईं ओर जो स्थान होता है, वहां भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय विराजमान माने जाते हैं। सबसे पहले इन दोनों स्थानों को अपने हाथों से स्पर्श करें। यहां जल अर्पित करें और 5 से 7 बार हल्के हाथों से दबाएं। इस दौरान शिव मंत्रों का जाप करें। ऐसा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और बच्चों से जुड़ी परेशानियां व रोग दूर होने की मान्यता है।

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दूसरा अशोक सुंदरी का स्थान

शिव पुराण के अनुसार, शिवलिंग के मध्य भाग, जहां से जल प्रवाहित होता है, वहां भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी का वास माना गया है। इस स्थान पर पहले बेलपत्र अर्पित करें। फिर इस स्थान को स्पर्श करते हुए जल चढ़ाएं। मन ही मन अपनी इच्छा भगवान शिव के सामने रखें। इस विधि से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और मांगलिक दोष से राहत मिलती है।

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तीसरा माता पार्वती का स्थान

शिवलिंग के चारों ओर बने गोल आधार (जलहरी) में माता पार्वती का वास माना जाता है। सबसे पहले इस स्थान को श्रद्धा से स्पर्श करें। फिर यहां जल अर्पित करें। मान्यता है कि इससे शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है और गंभीर बीमारियों में भी लाभ प्राप्त होता है।

अंत में जल अर्पित करें

इन तीनों पवित्र स्थानों का स्पर्श और पूजन करने के बाद अंत में पूरे शिवलिंग पर जल अर्पित करें। ऐसा करने से पूजा संपूर्ण मानी जाती है और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। Read More शिवलिंग पर जल अर्पण के समय किन तीन पवित्र स्थानों के स्पर्श करना है अत्यंत शुभ, जानिए उसका आध्यात्मिक महत्व…

VasantPanchami2026: बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनने की परंपरा क्यों है खास? जानिए इसके पाछे के धार्मिक, वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण…

BE NEWS – बसंत पंचमी का त्योहार मां सरस्वती की पूजा को समर्पित होता है। इस दिन सभी लोग देवी मां की आराधना  करते है। परम्परा के अनुसार इस दिन पर पीले वस्त्र पहने जाते है, पीले रंग के प्रसाद का मां को भोग लगाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते है कि इस त्योहार पर पीले रंग का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

बता दें बसंत पंचमी को श्री पंचमी और ज्ञान पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है और इसी दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है, जिन्हें ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की देवी कहा जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसे केवल एक रिवाज नहीं बल्कि प्रकृति, अध्यात्म और विज्ञान से जुड़ा हुआ माना जाता है। आइए जानते हैं कि बसंत पंचमी पर पीला रंग पहनने के पीछे क्या कारण हैं।

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1. पीला रंग और बसंत ऋतु का गहरा संबंध

बसंत ऋतु को ‘ऋतुराज’ कहा गया है क्योंकि यह मौसम खुशहाली, नई शुरुआत और सौंदर्य का प्रतीक होता है। इस समय खेतों में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं, जो प्रकृति में चारों ओर फैली हरियाली और बसंत ऋतु की पहचान बन जाती है। इसी वजह से बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनना प्रकृति के रंगों के साथ जुड़ने और ऋतु के स्वागत का प्रतीक माना जाता है।

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2. मां सरस्वती को प्रिय है पीला रंग

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां सरस्वती को सफेद और पीला रंग अत्यंत प्रिय है। शास्त्रों और चित्रों में देवी को अक्सर हल्के या पीले वस्त्रों में दर्शाया गया है, जो ज्ञान, शांति, सादगी और बुद्धि का प्रतीक हैं।

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3. पीला रंग देता है सकारात्मक ऊर्जा

रंगों का मन और शरीर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। पीला रंग ऊर्जा, उत्साह और सकारात्मक सोच का प्रतीक माना जाता है। यह मस्तिष्क को सक्रिय करता है और मन को प्रसन्न रखता है। इसलिए पीला रंग एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता बढ़ाने में सहायक माना जाता है। इसके साथ पीला रंग पित्त दोष को संतुलित करता है। ये शरीर में गर्माहट और ऊर्जा बनाए रखता है। इसके साथ- साथ सर्दियों के बाद बदलते मौसम में यह रंग शरीर के लिए लाभकारी होता है।

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4. पीले भोजन का विशेष महत्व

इस दिन केवल पीले कपड़े ही नहीं, बल्कि पीले रंग के भोजन बनाने की भी परंपरा है, जैसे- मीठे चावल, केसरिया हलवा, खिचड़ी और सरसों का साग। पीले रंग भोजन शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देते हैं, जो मौसम बदलने के समय उपयोगी होते हैं। साथ ही इन्हें समृद्धि और शुभता का प्रतीक भी माना जाता है।

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बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनना सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म, ऊर्जा और स्वास्थ्य का सुंदर मेल है। इसी कारण इस शुभ दिन पीले वस्त्र धारण करना पवित्र, मंगलकारी और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। Read More VasantPanchami2026: बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहनने की परंपरा क्यों है खास? जानिए इसके पाछे के धार्मिक, वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक कारण…

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानिए पीछे की परंपरा, पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व…

BE NEWS – मकर संक्रांति हिंदू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत शुभ पर्व माना जाता है। यह पर्व भगवान सूर्य की उपासना, दान-पुण्य और नई शुरुआत का प्रतीक है।

वर्ष 2026 में मकर संक्रांति 14 तो कई जगहों पर 15 जनवरी को यानि आज मनाई जा रही है। देश के कई हिस्सों में इसे खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घर-घर में खिचड़ी बनाई जाती है, भगवान को भोग लगाया जाता है इसके साथ ही जरूरतमंदों को इसका दान किया जाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस विशेष पर्व पर खिचड़ी का ही इतना महत्व क्यों है?

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बाबा गोरखनाथ से जुड़ी खिचड़ी खाने की परंपरा

मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा बाबा गोरखनाथ से जुड़ी मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, खिलजी के आक्रमण के समय देश में युद्ध का माहौल था। इस संघर्ष में कई योगी और वीर योद्धा भी शामिल थे, जिन्हें भोजन बनाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था। भूख और कमजोरी के कारण उनकी शक्ति क्षीण होने लगी थी।

ऐसे समय में बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह भोजन न केवल जल्दी तैयार होता था, बल्कि शरीर को तुरंत ऊर्जा भी देता था। इसी व्यंजन को ‘खिचड़ी’ नाम दिया गया। तभी से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने और खाने की परंपरा शुरू हुई। आज भी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर भव्य खिचड़ी मेला आयोजित किया जाता है।

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धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और अपने पुत्र शनि देव के घर जाते हैं। इस दिन शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उड़द दाल से बनी खिचड़ी विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। माना जाता है कि इस दिन खिचड़ी का सेवन करने से ग्रहों का शुभ प्रभाव जीवन और स्वास्थ्य पर पड़ता है।

खिचड़ी दान का विशेष महत्व

मकर संक्रांति पर केवल खिचड़ी खाना ही नहीं, बल्कि कच्ची खिचड़ी का दान करना भी अत्यंत पुण्य देने वाला माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन खिचड़ी का दान करने से घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती। साथ ही यह दान सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। मकर संक्रांति का पर्व हमें सरलता, सेवा और समर्पण का संदेश देता है। Read More Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानिए पीछे की परंपरा, पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व…

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति आज या कल? जानिए सही तिथि, धार्मिक महत्व और दान-पुण्य का शुभ समय

BE NEWS – नए साल का पहला बड़ा पर्व मकर संक्रांति इस बार लोगों के बीच असमंजस का कारण बन गया है। कैलेंडर में जहां 14 जनवरी 2026 की तारीख दर्ज है, वहीं देश के कई हिस्सों में यह पर्व 15 जनवरी 2026 को मनाया जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मकर संक्रांति कब मनानी चाहिए, खिचड़ी कब खानी है और दान-पुण्य का सही समय क्या है।

हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। इसे केवल एक त्योहार ही नहीं, बल्कि सूर्य की उपासना और सकारात्मक ऊर्जा के आगमन का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति का इंतज़ार लोग पूरे वर्ष करते हैं। इसे भारत के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल, केरल में  मकरविलक्कु, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण, जबकि उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है।

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मकर संक्रांति 2026 का शुभ मुहूर्त

ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव 14 जनवरी 2026 की रात 9 बजकर 19 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के इस राशि परिवर्तन को उत्तरायण कहा जाता है, जिसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। चूँकि यह परिवर्तन रात्रि काल में हो रहा है, इसलिए शास्त्रों में वर्णित उदयातिथि के सिद्धांत के अनुसार संक्रांति से जुड़े स्नान, दान और पर्व-उत्सव अगले दिन, यानी 15 जनवरी को ही करना शास्त्रसम्मत एवं फलदायी माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिस तिथि का उदय सूर्योदय के साथ होता है, उसी दिन उस पर्व का विधिवत पालन करना उचित होता है। इस कारण मकर संक्रांति का त्योहार 15 जनवरी को मनाया जाना शुभ रहेगा।

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क्यों हो रहा है मकर संक्रांति की तारीख को लेकर भ्रम?

मकर संक्रांति का पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर आधारित होता है। यह त्योहार चंद्रमा नहीं बल्कि सौर गणना पर निर्भर करता है। वर्ष 2026 में सूर्य का मकर राशि में प्रवेश (संक्रांति काल) 14 जनवरी को देर रात हो रहा है। यही कारण है कि अलग-अलग पंचांग और परंपराओं के अनुसार इसकी तिथि अलग मानी जा रही है। जिन जगहों पर उदयातिथि (सूर्योदय के समय की तिथि) को महत्व दिया जाता है, वहां मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जा रही है। वहीं कुछ पंचांग संक्रांति के समय को आधार मानते हैं, इसलिए वहां यह पर्व 14 जनवरी को ही मनाया गया।

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व

मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं और देवताओं का दिन आरंभ होता है। इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य और सूर्य देव की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। गंगा स्नान को विशेष रूप से मोक्षदायी माना गया है। इस दिन सूर्य उत्तरायण से खरमास समाप्त हो जाता है और शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।

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मकर संक्रांति के दिन क्या करें

इस दिन पर किसी भी पवित्र नदी या जलाशय में जाकर स्नान करें। अगर ये यह संभव न हो तो स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और आदित्य हृदय स्तोत्र या सूर्याष्टक का पाठ करें। तिल, गुड़, खिचड़ी और तिल से बने व्यंजनों का दान करें। जरूरतमंदों, ब्राह्मणों या मंदिर के पुजारी को अन्न और वस्त्र दान करना शुभ माना जाता है। Read More Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति आज या कल? जानिए सही तिथि, धार्मिक महत्व और दान-पुण्य का शुभ समय

Lohri 2026: देशभर में आज मनाया जा रहा है लोहड़ी का पर्व, आइए जानें क्यों खास है ये त्योहार, इसकी शुभ तिथि व ऐतिहािसक महत्व

BE NEWS – उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और आसपास के क्षेत्रों में लोहड़ी का पर्व सर्दियों की विदाई और नई ऋतु के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। अलाव की गर्माहट, लोकगीतों की गूंज और सामूहिक उल्लास के साथ मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और समाज के आपसी संबंधों का उत्सव है। हर वर्ष मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है।

2026 में कब मनाई जाएगी लोहड़ी

आज 13 जनवरी, दिन मंगलवार को देशभर में लोहड़ी को त्योहार मनाया जा रहा है। यह दिन सूर्य के उत्तरायण होने से पहले की आखिरी रात को दर्शाता है और शीत ऋतु के धीरे-धीरे समाप्त होने का संकेत देता है।

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 क्यों मनाई जाती है लोहड़ी

लोहड़ी के इस पर्व का संबंध सूर्य, अग्नि और फसल से जुड़ा हुआ है। किसान समुदाय के लिए यह पर्व खास महत्व रखता है क्योंकि इसी समय रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, खेतों में पकने लगती है। अलाव के चारों ओर तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और पॉपकॉर्न अर्पित कर प्रकृति और अग्नि देवता के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। यह परंपरा अच्छी फसल और समृद्धि की कामना का प्रतीक है।

लोहड़ी का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व

लोहड़ी का इतिहास पंजाब के लोकनायक दुल्ला भट्टी, जिन्हें ‘पंजाब का रॉबिनहुड’ कहा जाता है, से जुड़ा है। उन्होंने अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया और जरूरतमंद परिवारों, खासकर बेटियों के विवाह में सहायता की। लोहड़ी के पारंपरिक गीतों में आज भी दुल्ला भट्टी का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

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लोहड़ी का सांस्कृतिक महत्व

लोहड़ी नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए विशेष महत्व रखती है। भांगड़ा, गिद्धा, ढोल की थाप और सामूहिक नृत्य इस उत्सव को जीवंत बना देते हैं। यह पर्व सामूहिकता, भाईचारे और साझा खुशी का संदेश देता है।

लोहड़ी का संदेश

लोहड़ी हमें यह सिखाती है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी अपनी जड़ों और परंपराओं को नहीं भूलना चाहिए। अलाव की आग केवल ठंड नहीं मिटाती, बल्कि लोगों को एक-दूसरे के करीब लाती है और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक सेतु का काम करती है। Read More Lohri 2026: देशभर में आज मनाया जा रहा है लोहड़ी का पर्व, आइए जानें क्यों खास है ये त्योहार, इसकी शुभ तिथि व ऐतिहािसक महत्व

Makar Sankranti 2026: 14 या 15 जनवरी कब मनाया जाएगा संक्रांति पर्व, जानिए शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और क्या करें–क्या न करें

BE NEWS – हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। नए साल का पहला त्योहार है, कि बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह पुण्य पर्व मनाया जाता है। इसे केवल एक त्योहार ही नहीं, बल्कि सूर्य की उपासना और सकारात्मक ऊर्जा के आगमन का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति का इंतज़ार लोग पूरे वर्ष करते हैं।

भारत के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल, केरल में मकरविलक्कु, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण, जबकि उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है।

Makar Sankranti 2026:14 या 15 जनवरी कब है मकर संक्रांति? जानें शुभ योग ...

मकर संक्रांति 2026 का शुभ मुहूर्त

ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव 14 जनवरी 2026 की रात 9 बजकर 19 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के इस राशि परिवर्तन को उत्तरायण कहा जाता है, जिसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। चूँकि यह परिवर्तन रात्रि काल में हो रहा है, इसलिए शास्त्रों में वर्णित उदयातिथि के सिद्धांत के अनुसार संक्रांति से जुड़े स्नान, दान और पर्व-उत्सव अगले दिन, यानी 15 जनवरी को ही करना शास्त्रसम्मत एवं फलदायी माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिस तिथि का उदय सूर्योदय के साथ होता है, उसी दिन उस पर्व का विधिवत पालन करना उचित होता है। इस कारण मकर संक्रांति का त्योहार 15 जनवरी को मनाया जाना शुभ रहेगा।

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मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व

मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं और देवताओं का दिन आरंभ होता है। इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य और सूर्य देव की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। गंगा स्नान को विशेष रूप से मोक्षदायी माना गया है। इस दिन सूर्य उत्तरायण से खरमास समाप्त हो जाता है और शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।

मकर संक्रांति के दिन क्या करें

इस दिन पर किसी भी पवित्र नदी या जलाशय में जाकर स्नान करें। अगर ये यह संभव न हो तो स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और आदित्य हृदय स्तोत्र या सूर्याष्टक का पाठ करें। तिल, गुड़, खिचड़ी और तिल से बने व्यंजनों का दान करें। जरूरतमंदों, ब्राह्मणों या मंदिर के पुजारी को अन्न और वस्त्र दान करना शुभ माना जाता है।

मकर संक्रांति के दिन क्या न करें

1. स्नान और पूजा किए बिना भोजन ग्रहण न करें।

2. इस दिन पेड़-पौधों की कटाई से बचें।

3. तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से दूरी बनाए रखें।

4. सूर्योदय के बाद देर तक सोना और दिन में सोना अशुभ माना जाता है।

5. यदि कोई याचक सहायता मांगने आए तो उसे खाली हाथ न लौटाएं।

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Shattila Ekadashi 2026: षटतिला एकादशी पर पड़ रहा सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग, जानिए इसकी शुभ तिथि, पूजा विधि एंव धार्मिक महत्व…

BE NEWS – हमारे सनातन धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही महत्व है। भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह तिथि बहुत ही शुभ मानी होती है। हिंदू धर्म के अनुसार सालभर में कुल 24 एकादशी होती हैं। प्रत्येक माह में दो एकादशी व्रत आते हैं- एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में।

इसी क्रम में पंचाग के अनुसार माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस बार जनवरी में ये तिथि 13 या 14 कब पड़ रही इसको लेकर लोगों में संशय बना हुआ है। आइये आपको बताते है, इसकी शुभ तिथि और इसके धार्मिक महत्व के बारे में…

Shattila ekadashi 2025 til ke upaay ekadashi date and time Shattila ...

षटतिला एकादशी 2026 की तिथि

वैदिक पंचांग के अनुसार माघ माह की कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि की शुरुआत 13 जनवरी 2026, मंगलवार को दोपहर 3 बजकर 16 मिनट से होगी। वहीं इस तिथि का समापन 14 जनवरी 2026, बुधवार को शाम 5 बजकर 53 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी 2026, बुधवार को रखा जाएगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का संयोग भी बन रहा है, जिससे पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है।

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Shattila Ekadashi Puja Vidhi 2024 : षटतिला एकादशी के दिन इस विधि से ...

षटतिला एकादशी की पूजा विधि

षटतिला एकादशी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ कर चौकी स्थापित करें और उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान के समक्ष दीपक और धूप जलाएं। व्रत का संकल्प लें और एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। इस दिन तिल से बने व्यंजन तैयार कर भगवान को भोग अर्पित करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और प्रसाद ग्रहण करें।

षटतिला एकादशी शुभ मुहूर्त 2023 | षटतिला एकादशी का महत्व | षटतिला एकादशी ...

षटतिला एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व

षटतिला एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन तिल का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। षटतिला शब्द में षट का अर्थ छह और तिला का अर्थ तिल होता है। इस एकादशी पर तिल का छह प्रकार से उपयोग किया जाता है, जिसमें तिल का दान, तिल से स्नान, तिल का हवन, तिल से तर्पण, तिल का भोजन और तिल का उबटन शामिल है। मान्यता है कि इन उपायों को करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और जीवन में धन, वैभव और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। Read More Shattila Ekadashi 2026: षटतिला एकादशी पर पड़ रहा सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग, जानिए इसकी शुभ तिथि, पूजा विधि एंव धार्मिक महत्व…

Ekadashi January 2026: जनवरी 2026 में कब-कब रखा जाएगा एकादशी व्रत? जानें तिथि इस व्रत का महत्व और शुभ मुहूर्त

BE NEWS – हमारे सनातन धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही महत्व है। भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह तिथि बहुत ही शुभ मानी होती है। हिंदू धर्म के अनुसार सालभर में कुल 24 एकादशी होती हैं। प्रत्येक माह में दो एकादशी व्रत आते हैं- एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में।

एकादशी तिथि का महत्व

मान्यता है कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति के जीवन के कष्ट दूर होते हैं, सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने वाले करने वाले जातक को सभी प्रकार के कष्टों व पापों से मुक्ति मिलती है। साल 2026 की शुरुआत हो चुकी है। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में यह जानने की उत्सुकता है कि जनवरी 2026 में कौन-कौन सी एकादशी आएगी और उनका व्रत कब रखा जाएगा। आइए विस्तार से जानते हैं।

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जनवरी 2026 में पड़ने वाली एकादशी व्रत की सूची

1. षटतिला एकादशी 2026

वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी तिथि आरंभ 13 जनवरी 2026 को दोपहर 03:17 बजे और इसकी समाप्ति 14 जनवरी 2026 को शाम 05:52 बजे होगी। वहीं उदयातिथि के अनुसार 14 जनवरी 2026 को षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन मकर संक्रांति का पर्व भी मनाया जाएगा, जिससे इस तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है। षटतिला एकादशी पर तिल का विशेष महत्व होता है और दान-पुण्य करने से पापों से मुक्ति मिलती है।

तिथि: 14 जनवरी 2026 (बुधवार)
पक्ष: माघ माह, कृष्ण पक्ष

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Ekadashi Vrat 2026: षटतिला एकादशी व्रत कब है 13 या 14 जनवरी ...

2. जया एकादशी 2026

माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी तिथि आरंभ 28 जनवरी 2026 को दोपहर 04:35 बजे होगी। जिसकी समाप्ति 29 जनवरी 2026 को दोपहर 01:55 बजे होगी। वहीं उदयातिथि के अनुसार 29 जनवरी 2026 को जया एकादशी का व्रत रखा जाएगा। मान्यता है कि इस व्रत को करने से सभी प्रकार के भय और दोषों से मुक्ति मिलती है तथा आत्मिक शुद्धि होती है।

तिथि: 29 जनवरी 2026 (गुरुवार)
पक्ष: माघ माह, शुक्ल पक्ष

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एकादशी व्रत के दौरान इन बातों का रखें विशेष ध्यान

1. एकादशी के दिन घर और पूजा स्थल की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।

2. इस दिन चावल, अनाज और तामसिक भोजन का सेवन न करें।

3. भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।

4. अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्न, धन, वस्त्र या तिल का दान करें।

5. एकादशी व्रत का पारण हमेशा द्वादशी तिथि को ही करें।

एकादशी व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आत्मसंयम, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाता है। Read More Ekadashi January 2026: जनवरी 2026 में कब-कब रखा जाएगा एकादशी व्रत? जानें तिथि इस व्रत का महत्व और शुभ मुहूर्त

Sakat Chauth Vrat 2026: संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि का पावन पर्व सकट चौथ आज, जानिए कैसे करें पूजा विधि, कथा और इसका धार्मिक महत्व

BE NEWS – सनातन परंपरा में संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए अनेक व्रत-उपवास बताए गए हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत शुभ व फलदायी व्रत है सकट चौथ, जिसे तिलकुट चौथ भी कहा जाता है। यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है और मुख्य रूप से भगवान श्री गणेश एवं चौथ माता की पूजा को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि जो महिलाएं संतान की रक्षा और कल्याण के लिए या संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत करती हैं, उन्हें भगवान गणेश का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

सकट चौथ व्रत का महत्व

दरअसल सकट चौथ का व्रत विशेष रूप से माताओं के लिए माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान के जीवन से संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जल व्रत रखती हैं और रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करती हैं।

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Sakat Chauth पर गणपति बप्पा को लगाएं अपने हाथों से बने तिलकुट का भोग ...

सकट चौथ की पूजा विधि

इस दिन प्रातःकाल स्नान-ध्यान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सफेद तिल और गुड़ से तिलकुट्टा तैयार करें। एक चौकी पर जल का लोटा, रोली, अक्षत (चावल), तिल और तिलकुट्टा रखें और जल के लोटे पर रोली से सतिया बनाएं, और उस पर 13 बिंदियां लगाएं। हाथ में थोड़ा तिलकुट्टा लेकर सकट चौथ की कथा सुनें या पढ़ें। कथा पूर्ण होने के बाद तिलकुट्टा और कुछ रुपये एक कटोरी में रखकर बयना निकालें। यह बयना सास या साके समान किसी स्त्री को पैर छूकर दें। इसके बाद शाम के समय भगवान गणेश और चौथ माता की विधि-विधान से पूजा करें। चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें दूध का अर्घ्य दें, इसके बाद ही व्रत का पारण करें।

सकट चौथ की परंपराएं

इस दिन कई स्थानों पर तिल से बने पहार (पहाड़) को ढंककर रखा जाता है। अगले दिन सुबह पुत्र इसे खोलता है और सिक्के से काटकर सभी भाई-बंधुओं में बांट देता है। कहीं-कहीं तिल से बकरे की आकृति बनाकर उसे दूब या सिक्के से काटने की परंपरा भी है। मान्यता है कि यह परंपरा पशु बलि के स्थान पर प्रतीकात्मक रूप से शुरू की गई थी। इसके बाद सकट चौथ व्रत कथा का पाठ करें। Read More Sakat Chauth Vrat 2026: संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि का पावन पर्व सकट चौथ आज, जानिए कैसे करें पूजा विधि, कथा और इसका धार्मिक महत्व